Wednesday, February 29, 2012

गरुण पुराण अध्याय एक भाग तीन

कौन नरक की यात्रा करता है?

गरुण पुराण इस इस अंक हम गरुण पुराण अध्याय – 01 का तीसरा भाग देखनें जा रहे है जिसमें विष्णु भगवान श्री गरुण जी को बता रहे हैं कि ऐसे कौन से ब्यक्ति हैं जो नरक की यात्रा करते हैं ?

श्री विष्णु भगवान कहते हैं------

  • वह जो दया , धर्म एवं वर्णाश्रम का पालन नहीं करता

  • वह जो सदा पाप करता है

  • वह जो दुष्ट ब्यक्तियों की संगति करता है

  • वह जो वेद – पुराण में बताए गए मार्ग पर नहीं चलता

  • वह जो अहंकारी होता है

  • वह जो काम , क्रोध लोभ का गुलाम होता है

  • वह जो आसुरी प्रकृति वाला होता है

  • वह जो परायी स्त्री एवं पराये धन पर बुरी नज़र रखता है

  • वह जिसके जीवन का मूल आधार है भोग – विलास

    ऐसे लोग नरक जाते हैं /

गीता अध्याय – 16 में भगवान श्री कृष्ण के कुल 24 श्लोक हैं जिनमें श्लोक 16.1 – 16.3 तक दैवी प्रकृति के लोगों से सम्बंधित हैं एवं अन्य सभी श्लोक आसुरी प्रकृति वालों के सम्बन्ध में हैं /

कौन है दैवी प्रकृति वाला और कौन है आसुरी प्रकृति वाला?


वह जो तीन गुणों का गुलाम है वह हैआसुरी प्रकृति वालाऔर वह जो स्थिर – प्रज्ञ समभाव है तथा जिसके देह के सभीं नौ द्वार सात्त्विक गुण की उर्जा से नियंत्रित होते हैं वह हैदैवी प्रकृति वाला /

गरुण पुराण उन सबको नर्क का यात्री कहता है जिनमें तीन गुणों की ऊर्जा बहती है

और

उनको स्वर्ग गामी बताता है या मोक्ष प्राप्ति वाला बताता है जोगुणातीतहैं //


===== ओम्=======


Monday, February 27, 2012

गरुण पुराण अध्याय एक भाग दो

गरुण पुराण अध्याय एक के पिछले अंक में दो प्रश्न उठे थे जो इस प्रकार से हैं-----

सौनक ऋषि गण नैमिषारण्य में स्वर्ग प्राप्ति हेतु एक हजार साल की यज्ञ का आयोजन क्यों किया ?

गरुण जी जो विष्णु भगवान के संग हर पल रहते हैं उनके मन में यम यात्रा की बात कैसे आयी ?

नैमिषारण्य क्या और कहाँ है?

सौनक ऋषियों , नैमिषारण्य तथा हिंदू पुराणों का गहरा सम्बन्ध है / यह बन पंचाल एवं कोशल महाजन पदों के मध्य गोमती नदी के तट पर आज के सीतापुर [ लखनऊ के समीप ] , उत्तर प्रदेश के इलाके में था जहां दधीच जी हुआ करते थे जिनकी अस्थियों से बज्र का निर्माण हुआ था , असुरों के संहार के लिए / जब सौ़नक ऋषियों को कलि - युग आनें का भय सतानें लगा तब वे ब्रह्मा के पास गए यह पुछनें के लिए कि अब कहाँ रहना उचित होगा जहाँ कलि का कुप्रभाव न रहे / ब्रह्माजी उन ऋषियों को इस बन को उचित स्थान बताया / नैमिषारण्य वह बन है जहां वेद्ब्यास जी पुराणों की रचनाएँ की थी / यह इलाका विष्णुजी का है / सौनक ऋषि गण स्वर्ग प्राप्ति को क्यों चाहते थे ? यहाँ आप गीतासूत्र 2.42 – 2.46 , 14.15 , 6.40 – 6.45 , 9.20 – 9.22 को आप देखेंजहां प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं --- सात्विक गुण धारी को तब स्वर्ग मिलता है जब की साधना खंडित हो जाती है / प्रभु कहते हैं , स्वर्ग प्राप्ति साधना का लक्ष्य नहीं यह भोग से तृप्त होनें का एक अवसर है / प्रभु आगे कहते हैं , दो प्रकार के योगी होते हैं ; एक ऐसे योगी है जिनकी साधना वैराज्ञ में पहुंचनें के बाद खंडित हो जाती है और दूसरे ऐसे हैं जो अभी वैराज्ञ में नहीं पहुंचे होते हैं उनकी साधना खंडित हो जाती है / पहले प्रकार के योगी स्वर्ग न जा कर सीधे किसी योगी कुल में जन्म लते हैं और जन्म से वैरागी होते हुए आगे की साधना करते है और दूसरे प्रकार के योगी कुछ समय के लिए स्वर्ग में पहुंचते हैं जहां उनको ऐश्वर्य भोग मिलते हैं / ऐसे योगी वहाँ तबतक रहते हैं जबतक कि उनकी साधना का असर समाप्त नहीं हो जाता और तब वे पुनः किसी कुल में जन्म ले कर साधना में लग जाते हैं / प्रभु श्री कृष्ण गीता में कहते हैं ,

वेदों में भोग प्राप्ति एवं स्वर्ग प्राप्ति के बहुत प्रभावी एवं दिलचस्ब वर्णन दिए गए हैं जो लोगों के मन को मोह लेते हैं लेकिन हे अर्जुन तुम योग – क्षेम चाहत के परे के अन्तः करण वाला बन और परम गति को प्राप्त कर / अप् राप्ति के प्राप्ति का उपाय योग है और प्राप्त बस्तु की सुरक्षा का नाम है क्षेम /


वेद और गीता कुछ दूरी साथ – साथ तय करते है और फिर गीता परम धाम की ओर रुख करता है और वेद भोग प्राप्ति के लिए नाना प्रकार के यज्ञों में जुट जाते हैं/गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं,गीता योगी का वेदों से सम्बन्ध नाम मात्र का रह जाता है/

और कुछ रोचक बातें आप को अगले अंक में मिलेंगी


====ओम्======


Saturday, February 25, 2012

गरुण पुराण अध्याय एक भाग एक


18 पुरानों की रचनाएँ ब्यास जी द्वार की गयी लेकिन फिरभी ब्यास जी को बुद्धि स्तर पर शांति नहीं मिल पायी और अंत में ब्यास जी कहते हैं -----


अट्ठारह पुरानों में मात्र दो बाते हैं जिनको तरह – तरह ढंग से ब्यक्त करनें की कोशिश की गयी है जो इस प्रकार हैं ----


परोपकार से बढ़ कर कोई पुण्य नहीं


और किसी को दुःख पहुंचाने से बढ़ कर कोई पाप नही


18 पुरानों में से एक पुराण है गरुण पुराण / इस पुराण को उस ब्यक्ति को सुनाया जाता है जो अपनें परिवार के किसी सदस्य का दाह - संस्कार किया हुआ हो और प्रारंभिक बारह दिनों के सूदक में संन्यासी की भांति जीवन जीते हुए अपने परिवार के मृतक के आत्मा की शांति के लिए कर्म – काण्ड के नियमों का पालन कर रहा हो /


गरुण पुराण अध्याय –01


विष्णु भगवान के क्षेत्र में नैमिषारण्य में शौनक ऋषियों नें एक हजार वर्ष का नियम ले कर स्वर्ग प्राप्ति के लिए यज्ञ करनें का निश्चय किया / एक दिन यज्ञ के दैनिक समापन पर सूतजी वहाँ पधारे और ऋषि लोग सूतजी से यम – मार्ग का वर्णन सुनना चाहा / सूतजी महाराज उस कथा को गरुण पुराण के माध्यम से ऋषि लोगों को बताया जिसको भगवान विष्णुजी गरुन्जिको कभी सुनाया था / गरुण पुराण की कथा वस्तुतः भगवान विष्णु एवं गरुंजी के मध्य हुयी वार्ता है जिसका सीधा सम्बन्ध उस मार्ग से है जिस मार्ग से देह छोडनें के बाद आत्मा गमन करता है / सूतजी कहते हैं , हे ऋषि गणयम मार्ग पाप करने वाले ब्यक्ति के आत्मा के लिए अत्यंत दुःख दायी है और पुण्य करने वाल ब्यक्ति के आत्मा के लिए अत्यंत सुख दायी भी है /


गरुण जी भगवान विष्णु से जो पहला प्रश्न करते हैं वह सूतजी के शब्दों में इस प्रकार है -------


हे प्रभो ! भक्ति की महिमा आप हमें अनेक प्रकार से सुनाया है लेकिनआप मुझे उन दुखों के सन्दर्भ में कुछ बताएं जिनको प्राणियों को यम मार्ग में झेलना पड़ता है /


ऊपर की कथा में दो बातों पर आप ध्यान रखना -------




  • ऋषि गण स्वर्ग प्राप्ति को क्यों चाहते हैं?



  • गरुण जी महाराज जो विष्णु भगवान के साथ हर पल रहते हैं उनको यम मार्ग में पापियों को मिलने वाले दुखों को क्यों जानना चाहते हैं?


    ======ओम्=====






Thursday, February 23, 2012

आइन्स्टाइन एवं शांति


अभीं - अभीं वैज्ञानिक लोग यूरोप के किये गए परीक्षणों के आधार पर आइन्स्टाइन के मूल सिद्धांत को गलत करार कर दिया ; आइन्स्टाइन का कहना है - ऎसी कोई सूचना नहीं जिसकी रफ़्तार प्रकास की रफ़्तार से अधिक हो सके लेकिन अभीं - अभीं जेनेवा में किये गए प्रयोगों से वैज्ञानिकों को यह मिला की न्युट्रीनो जो एक सब एटामिक पार्टिकल है उसकी रफ़्तार प्रकाश से कुछ अधिक है /


आइन्स्टाइन सन1905में जब वे लगभग26साल के थे तब बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के आधार पर मात्र गणतीय तर्क के आधार पर सापेक्ष – सिद्धांत के अंतरगत आज के विज्ञान की बुनियादी बात कही थी और उनकी यह कही गयी बात आज के विज्ञान के दिल की धडकन बन गयी/


जब आइन्स्टाइन थे और हिटलर से उनका ताल्लुकात खराब हो चुके थे तब हिटलर के इशारे पर जर्मनी में तकरीबन एक सौ वैज्ञानिक एक साथ खड़े हो गए आइन्स्टाइन के खिलाफ और आइन्स्टाइन के वैज्ञानिक विचारों को गलत साबित करनें में उन लोगों नें कोई कसर न छोडी लेकिन वे सभीं असफल रहे / आइन्स्टाइन से किसी प्रकार नें प्रश्न किया की ये लोग आप के खिलाफ खड़े हैं और आप चुप हैं , यह बात तो ठीक नहीं दिखती आप को भी कुछ बोलना चाहिए , आइन्स्टाइन कहते हैं , यदि मैं गलत हूँ तो सौ लोगों की क्या जरुरत एक ही काफी था /


अब वैज्ञानिक समुदाय जो आइन्स्टाइन के सिद्धांत को गलत सिद्ध किये थे उनमें कुछ कहनें लगे हैं की हो सकता है बिजली की केबल का कनेक्सन ढीला रहा हो अतः पुनः परिक्षण करना होगा / आइन्स्टाइन सन 1955 में देह छोडी थी और आज इतनें साल बाद भी आज के वैज्ञानिक हिम्मत नहीं जुटा पा रहे की आइन्स्टाइन की बात पर लकीर फेरी जा सके , मैं ऐसे वैज्ञानिक को सैलूट करता हूँ /


आइन्स्टाइन जो आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान एवं न्यूक्लियर विज्ञान का जनक था वह अपनें जीवन में कितन शांत था ? इस सम्बन्ध में आइन्स्टाइन कहते हैं ------


मरनें के बाद यदि अगला जन्म स्व इच्छा से मिलता हो तो मैं एक नलका ठीक करनें वाला मिस्त्री बनाना चाहूँगा न की एक वैज्ञानिक ; मैं शांति के साथ जीना चाहता हूँ //


===== ओम् ======


Tuesday, February 21, 2012

शांति का द्रष्टा

मनुष्य मनुष्यों का राजा है

मनुष्य पशुओं का राजा है

मनुष्य सभीं जड़ – चेतन का नियंता है

मनुष्य के हाँथ में पृथ्वी,पाताल एवं नभ है

मनुष्य का अपना विज्ञान है

मनुष्य की अपनी चिकित्सा-पद्धति है

मनुष्य का अधिकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है

लेकिन -------

मनुष्य जैसा शांत एवं मनुष्य जैसा अशांत और कोई नहीं , इसका क्या कारण हो सकता है ?

क्या मनुष्यों के अलावा किसी और जीव को भीख मांगते देखा है ?

मनुष्य भीख मांगनें के लिए अन्य सभीं जीवों को नचाता है

लेकिन क्या अन्य जीव कभीं भीख माँगते हैं और क्या भीख मांगनें में मनुष्य को नचाते हैं ?

मनुष्य के अलावा क्या और कोई जीव आत्म हत्या करते हैं ?

आप एक बार मनुष्य एवं अन्य जीवों के जीवनों का द्रष्टा बन कर इस संसार को देखें आप जिस घडी द्रष्टा बनेंगे उसी घडी आप किसी और आयाम में होंगे और आप स्वयं को देख कर आश्चर्य में पड़ सकते हैं की यह मैं क्या कर रहा हूँ , लेकिन जो आप देखेंगे वही सत्य होगा /

अपनें जीवन को अपनें हाँथ में न पकड़ कर रखो

अपनें जीवन को प्रकृति के हाथों में ही रहनें दो

प्रकृति सब का जन्म दाता है ,

सबका संचालक है

और

सब के लिए एक नियम रखता है /


=====ओम्==========


Saturday, February 18, 2012

शांति एक राह है

शांति सभीं चाहते हैं

सभीं युद्ध भी चाहते हैं

युद्ध के बाद शांति और शांति के बाद युद्ध एक प्राकृतिक घटना है

युद्ध के ठीक बद विज्ञान के विकास की रफ्तार तेज हो जाती है

पहली-दूसरी विश्व – युद्ध के पूर्व के विज्ञान को देखें और उसके बाद के विज्ञान को भी देखें दोनों में फर्क आप को साफ – साफ़ नजर आएगा/

क्या शांति विज्ञान के विकास में अवरोध है?

यहाँ हम तर्क के आधार पर कुछ बातों को देखा जिनका सम्बन्ध शांति , युद्ध एवं विज्ञान के पारस्परिक संबंधों से है लेकिन एक बात हमें समझनी चाहिए की तर्क से विज्ञान की कुछ बातें तो मिल सकती हैं लेकिन सत्य तर्क से नहीं मिल सकता / विज्ञान में आप सर आइजक न्यूटन से ले कर सर सी वी रमण तक की खोजों को देखें , आप को कोई ऎसी खोज नही मिलेगी जिसमे कुछ परिवर्तन समय – समय पर न किया गया हो अर्थातविज्ञान में जो आज सत्य दिख रहा होता है वह कल असत्य बन जाता है / विज्ञान में तर्क की उर्जा काम करती है , जो संदेह आधारित होती है और सत्य की खोज श्रद्धा आधारित है , जितनी गहरी श्रद्धा होगी उतनी गहरी सत्य की चमक दिखेगी /

शांति के लिए जरुरी है ------

गुण तत्त्वों जैसे आसक्ति , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय एवं आलस्य तथा अपरा प्रकृति के तत्त्व अहंकार के प्रति होश बनाया जाए और यह होश हमें परम शांति से जोड़ सकता है / दो प्रकार की शांति हम अपने - अपनें जीवन में देखते हैं ; एक शांति भोग आहरित होती है जिमें अशांति का बीज अंकुरित हो रहा होता है और एक शांति वह शांति है जिसमें मनुष्य भोग – योग दोनों का द्रष्टा बन जाता है और इस स्थिति का नाम ही है परम शांति ///

==== ओम्=======



Friday, February 17, 2012

शांति गीता से संभव है

गीता सूत्र –10.22

वेदानां सामवेदः अस्मि देवानाम् अस्मि वासवः/

इन्द्रियाणाम् मनः च अस्मि भूतानाम् अस्मि चेतना//

प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं-----

वेदों में सामवेद देवताओं में वासव , इंद्रियों में मन और भूतों के अंदर चेतना मैं हूँ /

गीता सूत्र –10.35

बृहत्साम तथा साम्नां

प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं------

सामवेद के गीतों में बृहत्साम गीत मैं हूँ //

कुछ बातें ऊपर के सूत्रों के सन्दर्भ में ….........

  • सामवेद की क्या विशेषता है ?

  • सामवेद के गीतों में बृहत्साम गीत क्या है ?

  • इंद्रियों में मन की क्या स्थिति है ?

  • चेतना , बुद्धि एवं मन में क्या सम्बन्ध है ?

ऊपर के उठाये गए प्रशों को अगले अंकों में देखनें का प्रयाश किया जाएगा तबतक आप और हम

अपनी - अपनी बुद्धि को प्रभु श्री कृष्ण पर केंद्रित करते हैं //

===== ओम् ========



Wednesday, February 15, 2012

शांति क्या कोई बिषय है

शांति के लिए घर बनाया

शांति के लिए घर में भी मंदिर बनवाए

शांति के लिए पुत्र / पुत्री की प्राप्ति के लिए सोचते रहे और प्राप्त भी किया

शांति के लिए घर को भरना शुरू किया

शांति के लिए पकवानोंका चयन करते रहे

शांति के लिए नित नये - नये मित्र बनाते रहे

शांति के लिए कार खरीदा

शांति के लिए आभूषण इकठ्ठा किया

शांति के लिए पाठशालाएं बनवाए

शांति के लिए अनाथ आश्रमों की रचनाएँ की

शांति के लिए तीर्थों की रचनाये किये

शांति के लिए तीर्थों की यात्राएं की

शांति के लिए विज्ञान क्या - क्या नहीं कर रहा

शांति के लिए आज का योगी - समुदाय क्या - क्या नहीं कर रहा

शांति के लिए मनुष्य कल जो किया , आज जो कर रहा है और आनें वाले समय में जो करेगा उसे हम देख कर क्या कह सकते हैं ? लेकिन इतना तो स्पष्ट नजर आ ही रहा है मनुष्य की अशांति फ़ैल रहीहै और शांति दिन प्रति दिन सिकुड़ती चली जा रही है , आखिर इस विज्ञान का राज क्या है ?

=====ओम्=====


Tuesday, February 14, 2012

आत्मा की ओर

आत्मा

गीता श्लोक –2.17

अविनाशी तु तद्विद्धि येंन सर्वमिदं ततम् /

विनाश मव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति //

गीता श्लोक –2.18


अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता शरीरिण : /

अनाशिन : अप्रमेयस्यतस्माद्युध्यस्व भारत //


संभवतः भारत भूमि पर कोई ऐसा मिले जो यह कहनें में कोई संकोच न करे की वह आत्मा को नहीं जानता ? लेकिन क्या लोग आत्मा रहस्य को समझते भी हैं ? ऊपर गीत अध्याय – 2 के लगभग 13 आत्मा सम्बंधित भगवान श्री कृष्ण के सूत्र हैं जिनमें से हम यहाँ दो को ले रहे हैं / ऊपर गीता के दो श्लोकों में आत्मा के लिए प्रभु श्री कृष्ण निम्न शब्दों का प्रयोग किये हैं --------

अविनाशी[ Indestructible]

सर्वत्र [ Pervades everywhere ]

अब्यय[ immutable ]

अनाशिन [ Indestructible ]

अप्रमेय[ Incomprehensible ]

अर्थात

आत्मावह है जो सर्वत्र हो , जो अविनाशी हो , जो न घटता हो न बढ़ता हो और जिसको गणित के मापों के अंतर्गत न लाया जा सके /

मैं आप को आत्मा के सम्बन्ध में प्रभु श्री कृष्ण की कही गयी बातों के सम्बन्ध में अपनें सीमीत बुद्धि से असीम को बाधनें का काम कर रहा हूँजो संभव नहीं / मैं एक साधारण ब्यक्ति हूँ जिसको स्वयं आत्मा का बोध नहीं लेकिन सोचता हूँ क्या पता यदि इसी तरह गीता को पकड़ा रहा तो आप सब के माध्यम से मुझे भी एक दिन आत्मा का बोध हो जाए /


======ओम्=======




Monday, February 13, 2012

वैराज्ञ एवं संसार

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्ब्यातितरिष्यति /

तदा गन्तासि निर्वेदम् श्रोतब्यस्य श्रुतस्य च // गीता - 2.52

मोह एवं वैराज्ञ एक साथ एक समय में एक बुद्धि में नहीं रहते //

delusion and dispassion do not exist together

गीता समीकरण कहता है -----

मोह के साथ वैराज्ञ में कदम रखना असंभव है

वैराज्ञ बिना संसार को समझना असंभव है

वैरागी ही ज्ञानी हो सकता है

ज्ञानी कामना रहित एवं संकल्प रहित होता है

और

ज्ञानी समभाव योगी होता है

संसार का द्रष्टा भोग – आसक्ति से अछूता रहता है

संसार का द्रष्टा ही प्रभु की अनुभूति में होता है

गीता के समीकरण में क्या कहीं किसी प्रकार का संदेह है ? यदि नहीं तो फिर हम – आप क्यों गीता की ओर पीठ करके संसार के सम्मोहन की ऊर्जा के प्रभाव में आ कर भटक रहे हैं ?


====ओम्======


Wednesday, February 8, 2012

शांति पथ पर एक और कदम

आइये,आज शांति की खोज की राह पर हम स्वयं को देखते हैं/

  • हमारा जन्म बाहर – बाहर से देखनें पर शांती की खोज का ही एक भाग दिखता है

  • मन एवं मंदिर की मूल धातु एक है

  • मंदिर का जन्म मन आधारित ही है

  • जैसे देह में ह्रदय मध्य भाग में स्थित है वैसे मंदिर के मध्य भाग [ गर्भ गृह ] में प्रभु की मूर्ति होती है /

  • गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं , सबके ह्रदय में मैं निवास करता हूँ /

  • परिवार की रचना भी शांति की खोज की ही एक कड़ी है /

  • महल का निर्माण मनुष्य शांति की खोज के इरादे से करता है /

  • मनुष्य का जीवन शांति की खोज में गुजरता है लेकिन कितनें शांति को प्राप्त होते हैं ?

  • क्या धन – दौलत प्राप्ति में शांति है ?

  • क्या पुत्र प्राप्ति में शांति है ?

  • क्या मंदिर बनवानें में शांति है ?

  • क्या मंदिर आनें - जानें से शांति मिलती है ?

    अब

  • आप सोचो की आप शांति कीखोज में कहाँ हैं ?

====ओम्=======


Tuesday, February 7, 2012

शांति खोज का विषय नहीं

नरेंद्र[विवेकानन्द]श्री सत् गुर ु रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे

कैकेई राम बनबास से शांति पानी चाही

भरत चौदह साल अयोध्या से अपनें को अगल रख कर शांति पानी चाही

सीता श्री राम के संग बनबास में शांति देखी

लक्षमण की पत्नी को पति से चौदह साल अगल रहनें में शांति मिली

धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध में शांति दिखती रही जबतक युद्ध प्रारम्भ नहीं हुआ

महाभारत युद्ध से भाग कर भिखारी बन कर जीवन गुजारनें में अर्जुन को शांति दिख रही थी

प्रभु श्री कृष्ण को अर्जुन की शांति मोह रहित होनें में दिख रही थी

रावण को श्री राम से यद्ध करनें में शांति दिख रही थी

बुद्ध को ध्यान में शांति मिली

महाबीर को तप के माध्यम से शांति मिली

बिडला परिवार के एक सदस्य को भारत के हर शहर में मंदिर बनवानें में शांति दिख रही थी

यहाँ सभीं शांति की तलाश में भाग रहे हैं------

कामी को काम में शांति दिखती है … ........

योगी को राम में शांति दिखती है … ......

अब आप सोचो की आप को किसमें शांति दिखती है


=====ओम्========





Sunday, February 5, 2012

अभ्यास योग से शांति

मनुष्य आज शन्ति की खोज में ब्यस्त है चाहे वह वैज्ञानिक हो , चाहे वह योग को अपनाया हो या फिर भोगी हो / वैज्ञानिक लोग तन एवं मन की शांति में सुब्यवस्थित रूप से लगे हुए हैं , नयी - नयी औषधियों की खोज कर रहे हैं , ब्यायाम की नयी - नयी विधियों को तैयार कर रहे हैं लेकिन जैसे - जैसे शांति प्राप्ति के मध्यम विकसित हो रहे हैं मनुष्य और अधिक अशांत होता जा रहा है / समाज का एल पहलू है उनका जो अध्यात्मिक माध्यम से शांति की तलाश में हैं और इस समुदाय के लोग तरह – तरह के आसन , ध्यान जैसे साधनों को समाज के लोगों को दे रहे हैं लेकिन इन सब का मनुष्य के ऊपर कैसा प्रभाव हो रहा है , कुछ कहा नहीं जा सकता / समाज आ तीसरा वर्ग है भोगियों का जो बहुत बड़ा सनुदाय है ; आज यह कहना बहुत कठिन हो गया है कि कौन योगी है और कौन भोगी / भोगी भगवान को भी भोग का माध्यम बनाता जा रहा है और भोगी ही वह समुदाय है जोआज मंदिरों का निर्माण करवा रहा है , मूर्तियों का निर्माण करवा रहा है और मूर्तियों की दुकानें भी बना रखी है /

क्या शांति मंदिर जाने से मिलती है?

क्या शांति दवा लेनें से मिलती है?

क्या शांति का सम्बन्ध हमारे कर्मों से है?

गीता में अर्जुन को प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं , हे अर्जुन शांति प्राप्ति अभ्यास – योग से जब वैराज्ञ में कोई पहुंचता है तब उसका मन शांत होता है / अभ्यास – योग में मन के साथ होश बनानें का अभ्यास करना होता है ; मन जहाँ - जहाँ रुकता है उसे वहाँ - वहा से खीच कर आत्मा - परमात्मा पर केंद्रित करते रहना ही अभ्यास – योग है /

====ओम्=====


Friday, February 3, 2012

मन से तन की शांति

तन की शांति या मन की शांति?

तन की शांति जो खोजता है वह यातो तामस गुण से प्रभावित होता है या फिर राजस गुण से क्योंकि सात्त्विक गुण धारी के लिए देह एक माध्यम होता है जिसकी मदद से वह देही पर केंद्रित रहता है / तन का सुख क्षणिक सुख होता है जिस सुख में दुःख का बीज पल रहा होता है / तन की शांति यदि मन की शांति से मिल रही हो तो वह शांति परम से जोड़ सकती है लेकिन इंद्रिय स्तर पर देह की शांति जो भोग के माध्यम से मिलती है वह शांति मात्र भ्रम है /

शांति की खोज सबको है,इस खोज में मनुष्य कहाँ से कहां तक की यात्राएं करता है लेकिन उसे क्या वह शांति मिल पाती है जिसकी उसे तलाश होती है?शांति के लिए कुछ लोग हजारों का चढावा किसी मंदिर की मूर्ती पर चढ़ा देते हैं,शांति के नाम पर बड़े-बड़े मठ.मंदिर एवं अनेक धर्म से जुडी संस्थाएं चल रही हैं लेकिन वहाँ जो लोग रहते हैं,उन संस्थाओं को जो लोग चला रहे हैं ज़रा उनको देखना,वे लोग ऐसी हो सकते हैं जैसे बिष रस भरा कनक घट जैसे/

धर्म के नाम पर जो संस्थाएं चला रहे हैं उनकी संगत कुछ दिन करना और यह देखना की जिस मंदिर से वे जुड़े हैं उस मंदिर में जो मूर्ति है उसका उनके ह्रदय में कितना गहरा स्थान है ?

मन की शांति से मनुष्य की यात्रा परम शांति की ओर अपना रुख कर लेती है जिसके आगे और कोई शांति नहीं / मन की शांति कुछ करनें से नहीं मिलती जो हो रहा हो उसमें होश बनानें से आती है /


=====ओम्======