योग क्या है?
मैं कौन हूं ? कहां से आया हूं ? और क्यों आया हूं ? जिसे इन तीन प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं , वह विदेह हो जाता है और घड़ी भर जहां रुकता है , वह स्थान उस काल के लिए तीर्थ बन जाता है। ऐसा मनुष्य सिद्ध योगी होता है जिसे तत्त्ववित् भी कहते हैं।
ऊपर बताए गए तीन प्रश्न , सांख्ययोग और पतंजलि योग सूत्र दर्शन के आधार हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्र के आधार पर अब हम यहां योग को समझते हैं।
महर्षि पतंजलि कह रहे हैं …
“ योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:”
~ पतंजलि समाधिपाद सूत्र - 02~
ऐसी क्रियाएं जिनके अभ्यास से चित्त की वृत्तियों का निरोध हो , वे योग कहलाती है पर इतने से योग शब्द के रहस्य से पर्दा नहीं उठता। महर्षि पतंजलि के योग परिभाषा के संबंध में समाधिपाद सूत्र - 01 से पता चलता है कि योग क्या है ? जो निम्न प्रकार है …
“अथ योगानुशासनम् “
' अब योग अनुशासन प्रारंभ होता है '
यहां महर्षि योग को अनुशासन कह रहे हैं । अनुशासन दो शब्दों से मिल कर बना है - अनु + शासन। अनु का अर्थ है पहले से और शासन का अर्थ है जीवन जीने का यथार्थ मार्ग।
इस प्रकार समाधिपाद सूत्र :1 एवं सूत्र :2 को एक साथ देखने से जो सार निकलता है , वह निम्न प्रकार है …
पतंजलि यहां स्पष्ट रूप से कह रहे हैं , यह योग कोई नया नहीं अपितु पहले से चला आ रहा योग है, मैं तो मात्र इसे स्पष्ट कर रहा हूं । अब यहां प्रश्न उठ सकता है कि आखिर जो योग पतंजलि अपनें योग सूत्र दर्शन के माध्यम से बता रहे हैं , उससे चित्त की वृत्तियों का निरोध तो हो जाता है पर इससे होता क्या है ? इस प्रश्न के समाधान के लिए महर्षि पतंजलि समाधिपाद में अगले सूत्र :1.3 और सूत्र:1.4 में कहते हैं ..
पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 03
तदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम्
अर्थात
योग माध्यम से द्रष्टा ( पुरुष ) अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है
पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 04
वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र
वृत्ति स्वरुप जैसा अन्य स्थितियों में
समाधिपाद सूत्र : 3 और सूत्र :4 का एक साथ भावार्थ देखते हैं ….
योग को छोड़ शेष स्थितियों में पुरुष , चित्त स्वरूपाकार होता है जो योग सिद्धि मिलने पर अपने मूल स्वरूप में आ जाता है ।
अब ऊपर व्यक्त समाधिपाद सूत्र : 1 - 4 का सार एक साथ देखते हैं
जो लोग योग में स्थित नहीं होते , उनके अंदर स्थित शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी चित्त स्वरूपाकार होता है। वहीं व्यक्ति जब योग में स्थित होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष यह नहीं समझता कि वह चित्त है अपितु वह अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है । निरंतर योगाभ्यास करते रहने वाले योगी का योग जब सिद्ध होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष चित्त के बंधन से अपनें को मुक्त देखते हुए अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है जिसे कैवल्य कहते हैं ।
पतंजलि योग दर्शन समाधिपाद के प्रारंभिक 04 सूत्रों को ठीक से समझने के लिए योगदर्शन के शेष 191 सूत्रों के साथ सांख्य योग के सार को भी समझना होगा। लेकिन आगे बढ़ने से पहले यह जानलेना आवश्यक है कि चित्त की वृत्तियां क्या हैं? चित्त त्रिगुणी है और तीनों गुणों की अपनी - अपनी वृत्तियों है। सांख्य और योगसूत्र में बुद्धि , अहंकार और मन के समूह को चित्त कहते हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्रों की साधना से तामस एवं राजस गुणों की वृत्तियों का निरोध पहले होता है इस प्रकार जब चित्त केवल सात्त्विक गुणों की वृत्तियों के प्रभाव में रहने लगता है तब निरंतर योगाभ्यास से इन वृत्तियों का भी निरोध हो जाता है और चित्त गुणों की वृत्तियों के मुक्त रहने लगता है जिसे कैवल्य कहते हैं । कैवल्य पाद सूत्र : 34 में कैवल्य की परिभाषा को देखें …
पुरुषार्थ शून्यानाम् गुणानाम् प्रतिप्रसव: कैवल्यम् ।
स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।।
“ पुरुषार्थ का शून्य हो जाना और तीन गुणों की वृत्तियों का निरोध हो जाना , कैवल्य है ।
अब आगे की यात्रा पर निकलते हैं ….
पतंजलियोग दर्शन में कुल 195 सूत्र हैं और ईश्वरकृष्ण रचित सांख्य दर्शन में 71 कारिकायें हैं जिनमें से आखिरी 3 को छोड़ शेष 68 कारिकाओ का संबंध तत्त्व ज्ञान से है जो प्रारंभ उठाए गए तीन प्रश्नों का हल देते हैं ।
सांख्य दर्शन और पतंजलियोग सूत्र दर्शन एक दूसरे के पूरक दर्शन हैं। सांख्य दर्शन सिद्धांत देता है , सिद्धांत की सिद्धि प्राप्ति के उपाय स्वरूप योग का पूरा विज्ञान , महर्षि पतंजलि देते हैं। अतः बिना सांख्य दर्शन समझे ,पतंजलियोग सूत्र दर्शन को नहीं समझा जा सकता और बिना पतंजलि योगदर्शन ,सांख्य के सिद्धांतों की सिद्धि प्राप्त करना भी संभव नहीं।
सांख्य दर्शन , मैं कौन हूं की जिज्ञासा के समाधान का सिद्धांत देता है। सांख्य कहता है , त्रिगुणी , सनातन , स्वतंत्र , प्रसवधर्मी एवं जड़ तत्त्व प्रकृति एवं निर्गुणी , स्वतंत्र , सनातन एवं शुद्ध चेतन तत्त्व पुरुष के संयोग से सृष्टि है । पुरुष प्रकाश के प्रभाव में त्रिगुणी जड़ प्रकृति विकृत होकर बुद्धि , अहंकार , मन , 10 इंद्रियों, 5 तन्मात्र और 5 महाभूतों को उत्पन्न करती हैं। इन 23 तत्त्वों में प्रारंभिक तीन तत्त्वों ( बुद्धि , अहंकार , मन ) के समूह को चित्त कहते हैं, जैसा पहले भी बताया जा चुका है । प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व हैं क्योंकि इनका कारण मूल प्रकृति ( तीन गुणों की साम्यावस्था ) भी त्रिगुणी एवं जड़ हैं अतः कारण - कार्य सिद्धांत के आधार पर प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ होते हैं। प्रकृति - पुरुष संयोग होते ही शुद्ध चेतन पुरुष चित्त केंद्रित हो कर चित्त जैसा बन जाता है अर्थात शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी जड़ तत्त्व बन जाता है और प्रकृति पुरुष प्रकाश के प्रभाव में यह समझने लगती है कि उसे क्या करना है।
यहां एक गहरी शिक्षा मिलती है । जड़ की संगति में चेतन भी जड़ बन जाता है लेकिन चेतन की संगति में जड़ चेतन जैसा व्यवहार करने लगता है। जब आप किसी की संगति में हैं तो अपनी स्थिति को समझने की कोशिश अवश्य करें ।
पुरुष ,प्रकृति के 23 तत्त्वों के माध्यम से भोग से मिलने वाले सुख और दुःख की अनुभूति करता है और प्रकृति के 23 तत्त्व उसे इस कार्य में मदद करते हैं। प्रकृति जानती है कि पुरुष को अपने मूलभस्वरूप में लौटना है और जब वह अपने मूल स्वरूप में लौटेगा तब मैं भी अपने मूल स्वरूप में आ जाऊंगी । भोग अनुभव से पुरुष को वैराग्य होता है। वह प्रकृति के प्रति उदासीन हो जाता है और अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है। जब ऐसा होता है तब इसी के साथ-साथ प्रकृति के 23 तत्त्व अपनें - अपनें कारणों में लीन हो जाते हैं और अंततः बुद्धि प्रकृति में लीन हो जाती है और विकृति प्रकृति अपनें मूल स्वरूप (तीन गुणों की साम्यावस्था) में आ जाती है। पुरुष और प्रकृति दोनों अपने - अपनें मूल स्वरूप में निष्क्रिय होते हैं।
पतंजलि योगसूत्र आधारित योगाभ्यास की सिद्धि से चित्त की वृत्तियां शांत हो जाती है । वैराग्य की ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है । पुरुष प्रकृति का बोध हो जाता है और यही बोध कैवल्य है जिसकी प्राप्ति से आवागमन से मुक्ति मिल जाती है जिसे मोक्ष कहते हैं।
~~ ॐ ~~
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