● कहाँ हैं पर्वतराज मेरु ? ●
भारतके शास्त्रोंमें मेरु पर्वतका अपना अलग स्थान है , आखिर यह पर्वत है कहाँ ?
भागवत पुराणमें आप देखें : स्कन्ध : 3+4+ 5 +12 ** आज हम जिसे हिमालय कह रहे हैं उसकी उच्चतम शिखर अर्थात एवरेस्ट पौराणिक मेरु पर्वत हो सकती है । भागवत कहता है - मेरुके ऊपर ब्रह्म पूरी अर्थात ब्रह्माका निवास है और उसके घाटीमें नीचे 08 लोकपालोंकी अपनीं -अपनीं पुरियां हैं जैसे इंद्र आदि । गंगा स्वर्गसे ब्रह्म पूरीमें उतरी थी और उतरते ही चार धाराओं में विभक्त हो गयी । गंगाकी एक धारा सीता पूर्वकी ओर , एक चक्षु पश्चिमकी ओर ,भद्रा उत्तरकी ओर और अलखनंदा दक्षिणकी ओर क्रमशः भाद्रश्व वर्ष ,केतुमाल वर्ष , उत्तर कुरु और भारत से बहती हुयी सागर से जा मिली हैं ।
** अब मेरुकी भौगोलिक स्थितिके बारे देखते हैं :
* भारतवर्षके उत्तरमें क्रमशः हिमालय पर्वत , किम्पुरुष वर्ष , हेमकूट पर्वत ,हरि वर्ष और निषध पर्वत हैं । निषधके उत्तरमें है मेरु पर्वत जिसके ऊपर सुवर्ण ब्रह्माकी पूरी है ।
* मेरुके उत्तरमें क्रमशः नील पर्वत ,रम्यकवर्ष ,श्वेत पर्वत , हिरण्यम वर्ष ,श्रृंगवान पर्वत और उसके उत्तरमें है उत्तर कुरु वर्ष ।
** मेरुके पूर्वमें गंधमादक पर्वत और उसके पूर्वमें भाद्राश्वावर्ष है और मेरुके पश्चिममें माल्यावान पर्वत
है । माल्यावान पर्वतके पश्चिंममें है केतुमाल वर्ष ।
# सतयुगके प्रारम्भमें ब्रह्मावर्तके नरपति स्यायम्भुव मनुकी पुत्री देवहूतिका ब्याह हुआ, विन्दुसरके कर्मद ऋषिके साथ और पांचवें अवतार रूपमें कपिल मुनिका जन्म हुआ ।विन्दुसर सरस्वती नदीके तट पर था और उसमें पानी सरस्वतीका होता था ।आज विन्दुसर अहमदाबाद - उदयपुर रोड पर अहमदाबाद से 130 किलो मीटर पर है। विन्दुसर तीन तरफसे सरस्वतीसे घिरा था। ब्रह्मावर्तमें सरस्वती पूर्व मुखी थे और यह प्रदेश यमुना तट पर होता था । ब्रह्मावर्त वह स्थान है जहां दुसरे अवतार रूप में प्रभु वामन (सुकर )रूप धारण किया और पृथ्वीको रसातलसे ऊपर लेकर आये। ब्रह्मावर्तकी राजधानी थी बर्हिष्मती जिसका अर्थ है कुश की चटाई।इस देशमें कुशका जंगल पाया जाता था । भागवत कहता है - कर्मद ऋषि विमानसे अपनी पत्नी के साथ विन्दुसर से मेरु की घाटी की यात्रा की थी और बहुत समय तक वे वहाँ विहार करते रहे । उनके विहार करनें के स्थानों में सुरसन , वैश्रम्भक , नंदन , पुष्पभद्रा, चैत्ररथ , आदि उद्यान और मांस सरोवर हैं ।मृकंद ऋषि के पुत्र मार्कंडेय ऋषि का आश्रम पुष्पभद्रा नदी के तट पर चित्र शिलाके पास में था । मार्कंडेय ऋषिको पुष्पभद्राके तट नर नारायणके आशीर्वादसे माया का प्रलय कालीन स्वरुप देखनेंको मिला था जिसमें एक पत्तेके ऊपर प्रभु कृष्ण बाल रूपमें उन्हें दिखे थे ।
** मार्कंडेय ऋषिके आश्रमके विस्तारसे ऐसा दिखता है कि मानस सरोवर पुष्पभद्रा नदी और पुष्पभद्र उद्यान मेरुकी घाटीमें थे । आप अब मेरुके भौगोलिक स्थितिके सम्बन्ध में गूगल मैप पर देखते हुए कोई राय बना सकते हैं ।
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भागवतकी एक झलक
●● एक झलक ●●
श्रीमद्भागवत से कुछ बातें आपके सामनें हैं , इनको देखें और अपनें मूल को पहचानें ।
1- श्राद्ध देव मनु को 10 पुत्र थे जिनमें इक्ष्वाकु सबसे बड़े थे ।
2- इक्ष्वाकु के 100 पुत्रोंमें विकृत बड़े थे ।
3- इक्ष्वाकु बंश में 18वें राजा को कोई पुत्र न हुआ , उनकी पुत्रीसे मान्धाता पैदा हुए ।
4- आगे इक्ष्वाकु कुल पुत्रीके कुलसे चला ।
5- इक्ष्वाकु कुलके 27वें राजा हरिश्चंद हुए ।
6- सगर इस कुलके 36वें राजा थे ।
7- भागीरथ 40वें राजा हुए ।
8- 56वें राजा रघु थे और दशरथ 58वाँ सम्राट थे । 9- इस बंश में 86 वां बंसज था तक्षक ।
10- तक्षक परीक्षितको डसा था ।
11- इस बंशका आखिरी बंसज सूरत 110वाँ बंसज होगा फिर सूर्य बंशका अंत हो जाएगा ।
12- इस बंशका 79 वाँ है मरू जो सिद्ध योगीके रूप में आज भी कलाप नामक गाँव में अदृश्य रूपसे है और सूर्य बंशके अंत होने पर इस बंशको पुनः चलाएंगे।
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