सांख्य दर्शन में भाव सृष्टि और लिंग सृष्टि रहस्य
“भाव सृष्टि के बिना,लिंग सृष्टि का और लिंग सृष्टि के बिना भाव सृष्टि का कोई प्रयोजन नहीं ,दोनों एक दूसरे के पूरक हैं “
भाव सृष्टि को बुद्धि सृष्टि और लिंग सृष्टि को भौतिक सृष्टि भी कहते हैं। लिंग सृष्टि में इंद्रिय विषय (तन्मात्र) एवं पांच भूतों से निर्मित माता - पिता संयोग से प्राप्त स्थूल देह का निर्माण होता है। लिंग सृष्टि के 10 तत्त्वों के आश्रित रहने वाले तत्त्व – बुद्धि , अहंकार और इंद्रियों की उत्पत्ति , भाव सृष्टि है अतः भाव सृष्टि और लिंग सृष्टि को अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
अब ऊपर दिए गए सार की स्मृति में निम्न स्लाइड पर ध्यान केंद्रित करें ⤵️
1- भाव या बुद्धि सृष्टि
प्रकृति - पुरुष संयोग के फलस्वरूप बुद्धि की निष्पति है। बुद्धि से अहंकार (सात्त्विक+राजस+तामस) की उत्पत्ति है। अहंकार में सात्त्विक अहंकार से 11 इंद्रियों की निष्पति है।
बुद्धि , अहंकार और 11 इंद्रियां ही भाव सृष्टि हैं।
2- लिंग सृष्टि
पञ्च तन्मात्र और पञ्च महाभूत - ये 10 तत्त्व लिंग सृष्टि हैं। यहां ध्यान रखना होगा कि पञ्च तन्मात्रों का कारण तत्त्व तामस अहंकार है जो भाव सृष्टि का तत्त्व है और पञ्च तन्मात्र , पञ्च महाभूतों के कारण तत्त्व हैं। महाभूतों से माता - पिता संयोग से प्राप्त स्थूल देह है ।
भाव सृष्टि के तामस अहंकार तत्त्व की अनुपस्थिति में पञ्च तन्मात्रों का होना संभव नहीं और जब तन्मात्र नहीं होंगे तब उनके महाभूतों का भी होना संभव नहीं क्योंकि तन्मात्र , महाभूतों के कारण तत्त्व हैं और बिना कारण , कार्य का होना संभव नहीं अतः भाव सृष्टि के बिना लिंग सृष्टि का होना संभव नहीं।
भाव सृष्टि के 13 तत्त्व (बुद्धि +अहंकार+मन+10 इंद्रियां) अति सूक्ष्म तत्त्व हैं, इन्हें आश्रय चाहिए जिसके सहयोग से ये कार्य कर सकें और यह आश्रय स्थूल देह है। स्थूल देह माता - पिता संयोग से पञ्च महाभूतों से निर्मित है तथा पञ्च महाभूतों की निष्पति पञ्च तन्मात्रों से है। पञ्च तन्मात्र , तामस अहंकार से उत्पन्न है और तामस अहंकार,भाव सृष्टि का तत्त्व है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि भाव सृष्टि के तामस अहंकार तत्त्व से लिंग सृष्टि का अस्तित्व है।
भाव सृष्टि के बिना लिंग सृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं और बिना लिंग सृष्टि , भाव सृष्टि का कोई प्रयोजन नहीं।
भाव ( बुद्धि ) सृष्टि के 13 तत्त्वों ( महत्+अहंकार+मन
+10 इंद्रियां) को करण भी कहते हैं ( देखें कारिका : 32+33) । इनमें महत् (बुद्धि),अहंकार एवं मन को अंतःकरण और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं।
सात्त्विक,राजस और तामस गुणों के आधार पर अहंकार 03 प्रकार का होता है। ऊपर व्यक्त 13 तत्त्वों में महत् (बुद्धि) तत्त्व प्रकृति का कार्य है और अहंकार बुद्धि का कार्य है। सात्त्विक अहंकार के कार्य मन और 10 इंद्रियां हैं। कारण वे तत्त्व कहलाते हैं जिनसे कोई और तत्त्व की उत्पत्ति होती है। कारण तत्त्व से उत्पन्न होने वाले तत्त्व को उस कारण का कार्य कहते हैं । सांख्य दर्शन में कारण - कार्य सिद्धांत एक प्रमुख सिद्धांत हैं ( देखें कारिका - 09 )।
अंतःकरण तीनों कालों के बिषयों को ग्रहण करते हैं जबकि बाह्य करण केवल वर्तमान काल के बिषयों को ग्रहण करते हैं।
लिंग शरीर या सुक्ष्म शरीर (Cosmic Body)
बुद्धि,अहंकार,मन,10 इंद्रिय और 05 तन्मात्रों , इन 18 तत्त्वों के समूह को लिंग शरीर कहते हैं। बुद्धि , अहंकार और मन को चित्त या अंतःकरण कहते हैं।
प्रकृति - पुरुष संयोग में पुरुष चित्त केंद्रित हो जाता है और चित्त स्वरूपाकार बन जाता है अर्थात
जड़ एवं त्रिगुणी चित्त के साथ होने से शुद्ध चेतन एवं निर्गुणी पुरुष , सगुणी जैसा व्यवहार करने लगता है।
चित्त केंद्रित पुरुष प्रकृति के 23 तत्त्वों को अपने त्रिगुणी भोग के लिए उपकरणों की भांति प्रयोग करता है।चेतन पुरुष अब त्रिगुणी जड़ (अज्ञानी) की संगति में त्रिगुणी जड़ (अज्ञानी) जैसा दिखने लगता है। चित्त केंद्रित पुरुष त्रिगुणी भोगों का भोक्ता बन कर उनसे मिलने वाले सुख और दुःख का भोक्ता बन जाता है।
निरंतर त्रिगुणी भोग भोगते रहने के अनुभव से जब उसे वैराग्य हो जाता है तब वह अपने मूल स्वरूप में लौटता है और प्रकृति से अलग हो जाता है अर्थात अब वह प्रकृति के प्रति आसक्त नहीं रहता । पुरुष जा वैराग्य उसे अपने मूल स्वरूप में स्थित कर देता है और इसे की कैवल्य कहते है। तीन गुणों का प्रति प्रसव होना तथा चित्ताकार पुरुष का अपने नील स्वरूप में तीर होना ही कैवल्य है ( देखे पतंजलि कैवल्य पाद सूत्र : 34) ⤵️
पुरुषार्थ शून्यानाम् गुणानाम् प्रतिप्रसव: कैवल्यम् ।
स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।। कैवल्यपाद :34।।
जबतक पुरुष को कैवल्य नहीं मिल जाता तबतक प्रकृति लिंग शरीर के माध्यम से स्थूल देह में आवागमन करती रहती है और इसी को पुनर्जन्म भी कहते हैं।
कैवल्य के साथ विकृति प्रकृति के 23 तत्त्व अपने - अपने कारणों में लीन हो जाते हैं। अंततः बुद्धि का प्रकृति में लय हो जाता है और विकृत प्रकृति अपने मूल स्वरूप में आ जाती है जो तीन गुणों की साम्यावस्था है।
प्रकृति - पुरुष संयोग से भाव सृष्टि एवं लिंग सृष्टि की निष्पति तथा 18 तत्त्वों वाले लिंग शरीर माध्यम से प्रकृति का आवागमन में तबतक बने रहना जबतक पुरुष को कैवल्य नहीं मिल जाता, तक की सांख्य दर्शन - यात्रा यहीं पर कुछ घड़ी विश्राम करती हैं । आगे की यात्रा , अगले अंक में ।
~~ सांख्य दर्शन ~~