Friday, May 8, 2026

सांख्य दर्शन के 25 तत्त्व


सांख्य दर्शन के 25 तत्त्वों में अलिंग, लिंग, लिंग शरीर , कारण और कार्य तत्त्व 

सांख्य दर्शन में सनातन , निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष और सनातन त्रिगुणी जड़ प्रकृति के संयोग से 23 तत्त्वों की निष्पति बताई गई है जिनसे 14 प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति होती है (देखें , निम्न स्लाइड को ) ।

प्रकृति - पुरुष संयोग से जो 23 तत्व उत्पन्न होते है वे त्रिगुणी एवं जड़ तत्व हैं लेकिन पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में चेतन जैसे दिखते हैं। प्रकृति और पुरुष को अलिंग कहते हैं । प्रकृति - पुरुष संयोग से उत्पन्न 23 तत्त्वों  (महत्तत्व, अहंकार, 11 इंद्रियां , 05 तन्मात्र और 05 महाभूत) को  लिंग कहलाते हैं और लिंग तत्त्वों में 05 महाभूतों को छोड़ शेष 18 तत्त्वों को लिंग शरीर कहते हैं।

लिंग तत्व वे तत्व है जिनका अपने - अपने कारण तत्त्वों में लीन हो जाते हैं। अलिंग तत्व वे हैं जिनका कोई कारण तत्व नहीं होता अतः उनका लय नहीं होता। लिंग शरीर अति सूक्ष्म शरीर है जो आवागमन करता हैं अर्थात जो बार - बार अपने में स्थित पुरुष को कैवल्य दिलवाने हेतु स्थूल शरीर धारण करता रहता  है। यहां ध्यान रखवा होगा कि बिना पांच महाभूतों के अर्थात बिना माता - पिता से प्राप्त स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर अस्थिर रहता है।

ऊपर व्यक्त सांख्य के 25 तत्त्वों में पुरुष न कारण है और न कार्य। जो तत्त्व किसी और तत्व को उत्पन्न करते हैं , उन्हें कारण कहते हैं और उत्पन्न होने वाले तत्त्व को कार्य कहते हैं। 11 इंद्रियां और 05 महाभूत केवल कार्य हैं। प्रकृति केवल कारण है। महत्त्व , अहंकार और 05 तन्मात्र , कारण और कार्य दोनों हैं। 

~~ ॐ ~~

Tuesday, March 31, 2026

पतंजलि योगसूत्र में योग क्या है ?



योग क्या है?

 मैं कौन हूं ? कहां से आया हूं ? और क्यों आया हूं ? जिसे इन तीन प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं , वह  विदेह हो जाता है और घड़ी भर जहां रुकता है , वह स्थान उस काल के लिए तीर्थ बन जाता है। ऐसा मनुष्य सिद्ध योगी होता है जिसे तत्त्ववित्  भी कहते हैं। 

ऊपर बताए गए तीन प्रश्न , सांख्ययोग और पतंजलि योग सूत्र दर्शन के आधार हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्र के आधार पर अब हम यहां योग को समझते हैं।

महर्षि पतंजलि कह रहे हैं …

योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:”

~ पतंजलि समाधिपाद सूत्र - 02~

ऐसी क्रियाएं जिनके अभ्यास से चित्त की वृत्तियों का निरोध हो , वे योग कहलाती है पर इतने से योग शब्द के रहस्य से पर्दा नहीं उठता। महर्षि पतंजलि के योग परिभाषा के संबंध में समाधिपाद सूत्र - 01 से पता चलता है कि योग क्या है ? जो निम्न प्रकार है …

“अथ योगानुशासनम् “

' अब योग अनुशासन प्रारंभ होता है ' 

यहां महर्षि योग को अनुशासन कह रहे हैं । अनुशासन दो शब्दों से मिल कर बना है - अनु + शासन। अनु का अर्थ है पहले से और शासन का अर्थ है जीवन जीने का यथार्थ मार्ग।

इस प्रकार समाधिपाद सूत्र :1 एवं सूत्र :2 को एक साथ देखने से जो सार निकलता है , वह निम्न प्रकार है …

 पतंजलि यहां स्पष्ट रूप से कह रहे हैं , यह योग कोई नया नहीं अपितु पहले से चला आ रहा योग है, मैं तो मात्र इसे स्पष्ट कर रहा हूं । अब यहां प्रश्न उठ सकता है कि आखिर जो योग पतंजलि अपनें योग सूत्र दर्शन के माध्यम से बता रहे हैं , उससे चित्त की वृत्तियों का निरोध तो हो जाता है पर इससे होता क्या है ? इस प्रश्न के समाधान के लिए महर्षि पतंजलि समाधिपाद में अगले सूत्र :1.3 और सूत्र:1.4 में कहते हैं ..

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 03 

तदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम् 

अर्थात 

योग माध्यम से  द्रष्टा ( पुरुष ) अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है 

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 04

वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र

वृत्ति स्वरुप जैसा अन्य स्थितियों में 

समाधिपाद सूत्र : 3 और सूत्र :4 का एक साथ भावार्थ देखते हैं ….

योग को छोड़ शेष  स्थितियों में पुरुष , चित्त स्वरूपाकार होता है जो योग सिद्धि मिलने पर अपने मूल स्वरूप में आ जाता है ।

अब ऊपर व्यक्त समाधिपाद सूत्र : 1 - 4 का सार एक साथ देखते हैं 

जो लोग योग में स्थित नहीं होते , उनके अंदर स्थित शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी चित्त स्वरूपाकार होता है। वहीं व्यक्ति जब योग में स्थित होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष यह नहीं समझता कि वह चित्त है अपितु वह अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है । निरंतर योगाभ्यास करते रहने वाले योगी का योग जब सिद्ध होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष चित्त के बंधन से अपनें को मुक्त देखते हुए अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है जिसे कैवल्य कहते हैं ।

पतंजलि योग दर्शन समाधिपाद के प्रारंभिक 04 सूत्रों को ठीक से समझने के लिए योगदर्शन के शेष 191 सूत्रों के साथ सांख्य योग के सार को भी समझना होगा। लेकिन आगे बढ़ने से पहले यह जानलेना आवश्यक है कि चित्त की वृत्तियां क्या हैं? चित्त त्रिगुणी है और तीनों गुणों की अपनी - अपनी वृत्तियों है। सांख्य और योगसूत्र में बुद्धि , अहंकार और मन के समूह को चित्त कहते हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्रों की साधना से तामस एवं राजस गुणों की वृत्तियों का निरोध पहले होता है इस प्रकार जब चित्त केवल सात्त्विक गुणों की वृत्तियों के प्रभाव में रहने लगता है तब निरंतर योगाभ्यास से इन वृत्तियों का भी निरोध हो जाता है और चित्त गुणों की वृत्तियों के मुक्त रहने लगता है जिसे कैवल्य कहते हैं । कैवल्य पाद सूत्र : 34 में कैवल्य की परिभाषा को देखें …

पुरुषार्थ शून्यानाम् गुणानाम् प्रतिप्रसव: कैवल्यम् ।

स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।।

“ पुरुषार्थ का शून्य हो जाना और तीन गुणों की वृत्तियों का निरोध हो जाना , कैवल्य है ।

अब आगे की यात्रा पर निकलते हैं ….

 पतंजलियोग दर्शन में कुल 195 सूत्र हैं और ईश्वरकृष्ण रचित सांख्य दर्शन में 71 कारिकायें हैं जिनमें से आखिरी 3 को छोड़ शेष 68 कारिकाओ का संबंध तत्त्व ज्ञान से है जो प्रारंभ उठाए गए तीन प्रश्नों का हल देते हैं ।

सांख्य दर्शन और पतंजलियोग सूत्र दर्शन एक दूसरे के पूरक दर्शन हैं। सांख्य दर्शन सिद्धांत देता है , सिद्धांत की सिद्धि प्राप्ति के उपाय स्वरूप योग का पूरा विज्ञान , महर्षि पतंजलि देते हैं। अतः बिना सांख्य दर्शन समझे ,पतंजलियोग सूत्र दर्शन को नहीं समझा जा सकता और बिना पतंजलि योगदर्शन ,सांख्य के सिद्धांतों की सिद्धि प्राप्त करना भी संभव नहीं। 

सांख्य दर्शन , मैं कौन हूं की जिज्ञासा के समाधान का सिद्धांत देता है। सांख्य कहता है , त्रिगुणी , सनातन , स्वतंत्र , प्रसवधर्मी एवं जड़ तत्त्व प्रकृति एवं निर्गुणी , स्वतंत्र , सनातन एवं शुद्ध चेतन तत्त्व पुरुष के संयोग से सृष्टि है । पुरुष प्रकाश के प्रभाव में त्रिगुणी जड़ प्रकृति विकृत होकर बुद्धि , अहंकार , मन , 10 इंद्रियों, 5 तन्मात्र और 5 महाभूतों को उत्पन्न करती हैं। इन 23 तत्त्वों में प्रारंभिक तीन तत्त्वों ( बुद्धि , अहंकार , मन ) के समूह को चित्त कहते हैं, जैसा पहले भी बताया जा चुका है । प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व हैं क्योंकि इनका कारण मूल प्रकृति ( तीन गुणों की साम्यावस्था ) भी त्रिगुणी एवं जड़ हैं अतः कारण - कार्य सिद्धांत के आधार पर प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ होते हैं। प्रकृति - पुरुष संयोग होते ही शुद्ध चेतन पुरुष चित्त केंद्रित हो कर चित्त जैसा बन जाता है अर्थात शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी जड़ तत्त्व बन जाता है और प्रकृति पुरुष प्रकाश के प्रभाव में यह समझने लगती है कि उसे क्या करना है।

यहां एक गहरी शिक्षा मिलती है । जड़ की संगति में चेतन भी जड़ बन जाता है लेकिन चेतन की संगति में जड़ चेतन जैसा व्यवहार करने लगता है। जब आप किसी की संगति में हैं तो अपनी स्थिति को समझने की कोशिश अवश्य करें ।

 पुरुष ,प्रकृति के 23 तत्त्वों के माध्यम से भोग से मिलने वाले सुख और दुःख की अनुभूति करता है और प्रकृति के 23 तत्त्व उसे इस कार्य में मदद करते हैं। प्रकृति जानती है कि पुरुष को अपने मूलभस्वरूप में लौटना है और जब वह अपने मूल स्वरूप में लौटेगा तब मैं भी अपने मूल स्वरूप में आ जाऊंगी । भोग अनुभव से पुरुष को वैराग्य होता है। वह प्रकृति के प्रति उदासीन हो जाता है और अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है। जब ऐसा होता है तब इसी के साथ-साथ प्रकृति के 23 तत्त्व अपनें - अपनें कारणों में लीन हो जाते हैं और अंततः बुद्धि प्रकृति में लीन हो जाती है और विकृति प्रकृति अपनें मूल स्वरूप (तीन गुणों की साम्यावस्था) में आ जाती है। पुरुष और प्रकृति दोनों अपने - अपनें मूल स्वरूप में निष्क्रिय होते हैं। 

पतंजलि योगसूत्र आधारित योगाभ्यास की सिद्धि से चित्त की वृत्तियां शांत हो जाती है । वैराग्य की ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है । पुरुष प्रकृति का बोध हो जाता है और यही बोध कैवल्य है जिसकी प्राप्ति से आवागमन से मुक्ति मिल जाती है जिसे मोक्ष कहते हैं।

~~ ॐ ~~

Tuesday, February 3, 2026

उपनिषद् रहस्य


मुक्तिका उपनिषद् 

मुक्तिका उपनिषद् मध्यकालीन संभवतः 10वीं से 17वीं शताब्दी के बीच की मानी जाती है और कुछ विद्वान इसे दाराशिकोह के फारसी अनुवाद से  पहले का मानते हैं।

दारा शिकोह 1615 में पैदा हुआ और मुग़ल साम्राज्य के प्रसिद्ध शहंशाह शाहजहाँ और मुमताज़ महल का सबसे बड़ा पुत्र था । यह अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था। दारा शिकोह को एक विद्वान, दार्शनिक और सूफ़ी विचारधारा में गहरी रुचि रखने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। उसने इस्लाम और हिंदू धर्म के बीच साम्य स्थापित करने का प्रयास किया, जिसके लिए उसने संस्कृत ग्रंथों जैसे उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया। उसकी प्रसिद्ध रचना सिर्र-ए-अकबर (रहस्यमय रहस्य) और मजमा-उल-बहरैन (दो समुद्रों का मिलन) इस्लामी सूफ़ीवाद और हिंदू वेदांत दर्शन के बीच तालमेल को दर्शाती है। सत्ता के संघर्ष में उसका छोटा भाई औरंगज़ेब उससे आगे निकल गया। 1658 में समुगढ़ का युद्ध हारने के बाद, दारा शिकोह को गद्दी से वंचित कर दिया गया और 1659 में औरंगज़ेब के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई थी। दारा शिकोह को सन 1640 में कश्मीर की यात्रा के दौरान उन्हें पहली बार उपनिषदों के बारे में पता चला। इन ग्रंथों की दार्शनिक गहराई  उन्हें अचंभित कर दिया।  

दारा सन1654 में बनारस के संस्कृत पंडितों को दिल्ली बुलाकर उपनिषदों का फारसी मेंअनुवाद कराने का कार्य शुरू किया  और 1657 में 50 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में तैयार अनुवाद को सिर्र-ए-अकबर (The Great Secret) नामक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित करवाया। यह अनुवाद यूरोप पहुँचा, लैटिन में इसका अनुवाद हुआ जो आर्थर शॉपेनहावर जैसे अनेक दार्शनिकों को

 प्रभावित किया । आर्थर शॉपेनहावर जैसे दार्शनिकण उपनिषदों को "जीवन की सांत्वना" बताया।

मुक्तिका उपनिषद् एक महत्वपूर्ण उपनिषद है, जो 108 उपनिषदों की आधिकारिक और सर्वमान्य सूची प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध है। यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित मानी जाती है और यह सामान्य उपनिषदों की श्रेणी में आती है।

मुख्य विशेषताएँ

यह एक संवाद रूप में है, जिसमें भगवान श्रीराम अपने परम भक्त हनुमान जी को मोक्ष (मुक्ति) का मार्ग और उपनिषदों का ज्ञान देते हैं। इसलिए इसका नाम मुक्तिका (मोती या मुक्ति का प्रतीक) पड़ा है। इसमें कुल लगभग 125 श्लोक (या मंत्र) हैं, जो निम्न प्रकार दो अध्यायों में विभाजित हैं….

प्रथम अध्याय (करीब 49 श्लोक )

मुक्ति के विभिन्न प्रकारों (जैसे क्रम मुक्ति, सद्य मुक्ति, जीवन्मुक्ति, विदेह मुक्ति) का वर्णन, और कैवल्य मुक्ति (पूर्ण अद्वैत ज्ञान से मुक्ति) को सर्वोच्च बताना।

द्वितीय अध्याय (करीब 76 श्लोक)

108 उपनिषदों की विस्तृत सूची, उनके वेदों से संबंध और वर्गीकरण (मुख्य, सामान्य, योग, संन्यास, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि)।

मुक्तिका उपनिषद् का मुख्य सार

मुक्ति का एकमात्र सच्चा प्रकार: कैवल्य (पूर्ण अद्वैत ज्ञान से आत्मा का ब्रह्म में लीन होना)।

राम जी कहते हैं कि इन 108 उपनिषदों का अध्ययन (श्रवण, मनन, निदिध्यासन) करने से पाप नष्ट होते हैं, और एक बार सुनने मात्र से भी मुक्ति का मार्ग खुलता है।

मांडूक्य उपनिषद् का विशेष महत्व: राम जी कहते हैं कि यदि केवल मांडूक्य उपनिषद् (और उसकी गौडपाद कारिका) का पूर्ण ज्ञान हो जाए, तो भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

ये 108 उपनिषद् सभी वेदों के सार हैं और इन्हें गुरु से पढ़कर जीते जी मुक्ति और अंत में विदेह मुक्ति प्राप्त होती है।

मुक्तिका उपनिषद् उपनिषदों का "कैनन" या निर्देशक ग्रंथ है। यह बताता है कि मुक्ति के लिए ज्ञान मार्ग (वेदांत) सर्वोत्तम है, और इन 108 उपनिषदों का अध्ययन मोक्ष का सीधा साधन है। 

मुक्तिका उपनिषद् ही वह एकमात्र ग्रंथ है जो 108 उपनिषदों की पूरी सूची देता है, जो सर्वमान्य है। ये चार वेदों में निम्न प्रकार विभाजित हैं…

ऋग्वेद > 10 उपनिषद् , शुक्ल यजुर्वेद >19 उपनिषद्

कृष्ण यजुर्वेद > 32 उपनिषद् , सामवेद > 16 उपनिषद्

अथर्ववेद > 31 उपनिषद् ।

इन 108 उपनिषदों में प्रमुख 10 उपनिषद् निम्न हैं …

ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक । इनका भाष्य आदि शंकराचार्य जी द्वारा लिखा गया है और इन्हें देशोपनिषद् कहते हैं। इनके बारे में अगले अंक में चर्चा होगी ।

।।।। ॐ।।।।