सांख्य कारिका : 31
बुद्धि , अहंकार और मन समीकरण
स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूत हेतुकाम् वृत्तिम्।
पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित्कार्यते करणम्।। 31।।
सारांश
यह कारिका सांख्य दर्शन के मूल सिद्धांत - सृष्टि , प्रकृति - पुरुष संयोग का फल है जिसका प्रयोजन पुरुषार्थ है , की ओर इशारा कर रही है।
बुद्धि , अहंकार एवं मन समीकरण
👉13 करण परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय के आधार पर अपनीं - अपनीं वृत्तियों को धारण करते हैं । उन सभी वृत्तियों का पुरुषार्थ ( मोक्ष ) ही उद्देश्य है और ये करण स्वयं ही प्रवृत्त होते हैं , किसी से नियंत्रित होकर नहीं प्रवृत्त होते ।
पुरुषार्थ क्या है ?
त्रिगुणी,जड़ एवं अचेतन प्रकृति और निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष के संयोग का फल, सृष्टि- निष्पति है। त्रिगुणी भोग एवं भोग से मिलने वाले सुख - दुःख की अनुभूति के लिए पुरुष , प्रकृति से संयोग करता है।
प्रकृति पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में जड़ होते हुए भी चेतन जैसा व्यवहार करने लगती है और वह सोचती है कि अनुभव प्राप्ति के साथ पुरुष को अपनें मूल स्वरूप में लौट जाना चाहिए जिसे मोक्ष या कैवल्य कहते हैं।
प्रकृति अपनें इस सोच के आधार पर पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में विकृत हो कर 23 तत्त्वों ( 13 करण , 05 तन्मात्र एवं 05 महाभूतों) की उत्पत्ति करती है। इन 23 तत्त्वों में प्रारंभिक 03 तत्त्वों (बुद्धि , अहंकार और मन , जिन्हें अंतःकरण या चित्त कहते हैं) में पुरुष केंद्रित रहते हुए त्रिगुणी पदार्थों का सेवन करता है और उनसे मिलने वाले सुख - दुःख को
भोगता है। भोगके गहरे अनुभव से उसे इस भोग से वैराग्य प्राप्त हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह अपने मूल स्वरूप में लौट आता है जिसे कैवल्य कहते हैं । पुरुष द्वारा त्रिगुणी पदार्थों का भोग करना और भोग अनुभव से मुक्त हो जाना ही पुरुषार्थ ( पुरुष का प्रयोजन ) कहलाता है।
कारिका के शब्दों का अर्थ
स्वां स्वां > अपनी-अपनी, प्रतिपद्यन्ते > प्राप्त करती/करते हैं, ग्रहण करती/करते हैं,परस्पर > एक-दूसरे के,
आकूत > आकांक्षा, इच्छा, उद्देश्य,हेतुकाम् > हेतु (कारण) वाली, प्रेरित,वृत्तिम् > वृत्ति (क्रिया, कार्य, प्रवृत्ति),
पुरुषार्थ > पुरुष का प्रयोजन (भोग और अपवर्ग),
एव > ही,हेतु: > कारण, हेतु,न > नहीं,केनचित् > किसी भी (बाहरी) के द्वारा,कार्यते > कराया जाता है, प्रेरित किया जाता है, करणम् > करण (13 करण : बुद्धि , अहंकार , मन और 10 इंद्रियां) ।
कारिका का हिंदी भावार्थ
पुरुषार्थ (पुरुष के भोग एवं मोक्ष ) प्राप्ति के लिए बिना किसी बाहरी शक्ति के प्रभाव में आए स्वतंत्र रूप से 13 करण अपनी-अपनी वृत्तियों को एक-दूसरे के अभिप्राय कॉन्समझते हुए अपनी - अपनी वृत्तियों को धारण करते हैं।
विस्तृत व्याख्या
सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि, अहंकार, मन और दस इन्द्रियाँ (कुल 13 करण) स्वयं त्रिगुणी एवं अचेतन हैं पर पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में चेतन जैसे दिखते हैं । ये 13 करण आपस में मिलकर एक-दूसरे की प्रेणना के आधार पर कार्य करते हैं तथा अपनी-अपनी विशेष वृत्ति को धारण करते हैं। इनकी क्रियाओं का अंतिम उद्देश्य पुरुष को त्रिगुणी पदार्थों का भोग कराना , उनसे प्राप्त सुख-दुःख का अनुभव कराना और अंत में अपवर्ग (मुक्ति) दिलाना है। प्रकृति जनित 13 करण बाहरी शक्ति द्वारा नहीं चलाए जाते अपितु इनका संचालन प्रकृति के गुणों और पुरुष के प्रयोजन के कारण स्वाभाविक रूप से होता है।
करण का अर्थ: कार्य करना/कार्य करने वाला।
सांख्य दर्शन में 13 करण हैं, जैसा ऊपर बताया गया है। इनमें बुद्धि , अहंकार और मन को अंतःकरण या चित्त कहते हैं और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं।
03 अंतः करणों की वृत्तियां
1. बुद्धि (महत् तत्त्व) की वृत्ति
निश्चय करना, निर्णय लेना, निष्कर्ष निकालना, विवेकपूर्वक समझना।
बुद्धि के कार्य — इन्द्रियों और मन से आने वाली सूचनाओं को व्यवस्थित करके निश्चित रूप देना।
बुद्धि की अन्य सहायक वृत्तियाँ
धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (सात्विक भाव) तथा अधर्म , अज्ञान , राग एवं अनेश्वर्य (तामसिक भाव )।
2. अहंकार की वृत्ति: अभिमान
3. मन की वृत्ति:
सोचना, कल्पना करना, इच्छा करना, संदेह करना, एक विषय से दूसरे विषय पर घूमना।
मन इन्द्रियों से प्राप्त सूचनाओं को इकट्ठा करता है और उन्हें बुद्धि तक पहुँचाता है। यह संकल्प (हाँ/करना) और विकल्प (नहीं/न करना) के बीच दोलन करता रहता है।
~~ॐ~~