Sunday, May 17, 2026

सांख्य दर्शन में बुद्धि अहंकार एवं मन समीकरण

सांख्य कारिका : 31

बुद्धि , अहंकार और मन समीकरण

स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूत हेतुकाम् वृत्तिम्।

पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित्कार्यते करणम्।। 31।।

सारांश

यह कारिका सांख्य दर्शन के मूल सिद्धांत - सृष्टि , प्रकृति - पुरुष संयोग का फल है जिसका प्रयोजन पुरुषार्थ है , की ओर इशारा कर रही है।

बुद्धि , अहंकार एवं मन समीकरण

👉13 करण परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय के आधार पर अपनीं - अपनीं वृत्तियों को धारण करते हैं । उन सभी वृत्तियों का पुरुषार्थ ( मोक्ष ) ही उद्देश्य है और ये करण स्वयं ही प्रवृत्त होते हैं , किसी से नियंत्रित होकर नहीं प्रवृत्त होते । 

 पुरुषार्थ क्या है ?

 त्रिगुणी,जड़ एवं अचेतन प्रकृति और निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष के संयोग का फल, सृष्टि- निष्पति है। त्रिगुणी भोग एवं भोग से मिलने वाले सुख - दुःख की अनुभूति के लिए पुरुष , प्रकृति से संयोग करता है।

 प्रकृति पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में जड़ होते हुए भी चेतन जैसा व्यवहार करने लगती है और वह सोचती है कि अनुभव प्राप्ति के साथ  पुरुष को अपनें मूल स्वरूप में लौट जाना चाहिए जिसे मोक्ष या कैवल्य कहते हैं।

 प्रकृति अपनें इस सोच के आधार पर पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में विकृत हो कर  23 तत्त्वों ( 13 करण , 05 तन्मात्र एवं 05 महाभूतों) की उत्पत्ति करती है। इन 23 तत्त्वों में प्रारंभिक 03 तत्त्वों (बुद्धि , अहंकार और मन , जिन्हें अंतःकरण या चित्त कहते हैं)  में पुरुष केंद्रित रहते हुए त्रिगुणी पदार्थों का सेवन करता है और उनसे मिलने वाले सुख - दुःख को 

भोगता है। भोगके गहरे अनुभव से उसे इस भोग से वैराग्य प्राप्त हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह अपने मूल स्वरूप में लौट आता है जिसे कैवल्य कहते हैं  । पुरुष द्वारा त्रिगुणी पदार्थों का भोग करना और भोग अनुभव से मुक्त हो जाना ही पुरुषार्थ ( पुरुष का प्रयोजन ) कहलाता है।

कारिका के शब्दों का अर्थ 

स्वां स्वां > अपनी-अपनी, प्रतिपद्यन्ते > प्राप्त करती/करते हैं, ग्रहण करती/करते हैं,परस्पर > एक-दूसरे के,

आकूत > आकांक्षा, इच्छा, उद्देश्य,हेतुकाम् > हेतु (कारण) वाली, प्रेरित,वृत्तिम् > वृत्ति (क्रिया, कार्य, प्रवृत्ति),

पुरुषार्थ > पुरुष का प्रयोजन (भोग और अपवर्ग),

एव > ही,हेतु: > कारण, हेतु,न > नहीं,केनचित् > किसी भी (बाहरी) के द्वारा,कार्यते > कराया जाता है, प्रेरित किया जाता है, करणम् > करण (13 करण : बुद्धि , अहंकार , मन और 10 इंद्रियां) ।

कारिका का हिंदी भावार्थ

पुरुषार्थ (पुरुष के भोग एवं मोक्ष ) प्राप्ति के लिए बिना किसी बाहरी शक्ति के प्रभाव में आए स्वतंत्र रूप से 13 करण अपनी-अपनी वृत्तियों को एक-दूसरे के अभिप्राय कॉन्समझते हुए अपनी - अपनी वृत्तियों को धारण करते हैं।

विस्तृत व्याख्या

सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि, अहंकार, मन और दस इन्द्रियाँ (कुल 13 करण) स्वयं त्रिगुणी एवं अचेतन हैं पर पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में चेतन जैसे दिखते हैं । ये 13 करण आपस में  मिलकर एक-दूसरे की प्रेणना के आधार पर कार्य करते हैं तथा अपनी-अपनी विशेष वृत्ति को धारण करते हैं। इनकी क्रियाओं का अंतिम उद्देश्य पुरुष को त्रिगुणी पदार्थों का भोग कराना , उनसे प्राप्त सुख-दुःख का अनुभव कराना और अंत में अपवर्ग (मुक्ति) दिलाना है। प्रकृति जनित 13 करण बाहरी शक्ति द्वारा नहीं चलाए जाते अपितु इनका संचालन प्रकृति के गुणों और पुरुष के प्रयोजन के कारण स्वाभाविक रूप से होता है।

करण का अर्थ: कार्य करना/कार्य करने वाला।

सांख्य दर्शन में 13 करण हैं, जैसा ऊपर बताया गया है। इनमें बुद्धि , अहंकार और मन को अंतःकरण या चित्त कहते हैं और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं।

03 अंतः करणों की वृत्तियां

1. बुद्धि (महत् तत्त्व) की वृत्ति

निश्चय करना, निर्णय लेना, निष्कर्ष निकालना, विवेकपूर्वक समझना। 

बुद्धि के कार्य — इन्द्रियों और मन से आने वाली सूचनाओं को व्यवस्थित करके निश्चित रूप देना।

बुद्धि की अन्य सहायक वृत्तियाँ

धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (सात्विक भाव) तथा अधर्म , अज्ञान , राग एवं अनेश्वर्य (तामसिक भाव )।

2. अहंकार की वृत्ति: अभिमान 

3. मन की वृत्ति:

 सोचना, कल्पना करना, इच्छा करना, संदेह करना, एक विषय से दूसरे विषय पर घूमना।

मन इन्द्रियों से प्राप्त सूचनाओं को इकट्ठा करता है और उन्हें बुद्धि तक पहुँचाता है। यह संकल्प (हाँ/करना) और विकल्प (नहीं/न करना) के बीच दोलन करता रहता है।

~~ॐ~~

Friday, May 8, 2026

सांख्य दर्शन के 25 तत्त्व


सांख्य दर्शन के 25 तत्त्वों में अलिंग, लिंग, लिंग शरीर , कारण और कार्य तत्त्व 

सांख्य दर्शन में सनातन , निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष और सनातन त्रिगुणी जड़ प्रकृति के संयोग से 23 तत्त्वों की निष्पति बताई गई है जिनसे 14 प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति होती है (देखें , निम्न स्लाइड को ) ।

प्रकृति - पुरुष संयोग से जो 23 तत्व उत्पन्न होते है वे त्रिगुणी एवं जड़ तत्व हैं लेकिन पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में चेतन जैसे दिखते हैं। प्रकृति और पुरुष को अलिंग कहते हैं । प्रकृति - पुरुष संयोग से उत्पन्न 23 तत्त्वों  (महत्तत्व, अहंकार, 11 इंद्रियां , 05 तन्मात्र और 05 महाभूत) को  लिंग कहलाते हैं और लिंग तत्त्वों में 05 महाभूतों को छोड़ शेष 18 तत्त्वों को लिंग शरीर कहते हैं।

लिंग तत्व वे तत्व है जिनका अपने - अपने कारण तत्त्वों में लीन हो जाते हैं। अलिंग तत्व वे हैं जिनका कोई कारण तत्व नहीं होता अतः उनका लय नहीं होता। लिंग शरीर अति सूक्ष्म शरीर है जो आवागमन करता हैं अर्थात जो बार - बार अपने में स्थित पुरुष को कैवल्य दिलवाने हेतु स्थूल शरीर धारण करता रहता  है। यहां ध्यान रखवा होगा कि बिना पांच महाभूतों के अर्थात बिना माता - पिता से प्राप्त स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर अस्थिर रहता है।

ऊपर व्यक्त सांख्य के 25 तत्त्वों में पुरुष न कारण है और न कार्य। जो तत्त्व किसी और तत्व को उत्पन्न करते हैं , उन्हें कारण कहते हैं और उत्पन्न होने वाले तत्त्व को कार्य कहते हैं। 11 इंद्रियां और 05 महाभूत केवल कार्य हैं। प्रकृति केवल कारण है। महत्त्व , अहंकार और 05 तन्मात्र , कारण और कार्य दोनों हैं। 

~~ ॐ ~~

Tuesday, March 31, 2026

पतंजलि योगसूत्र में योग क्या है ?



योग क्या है?

 मैं कौन हूं ? कहां से आया हूं ? और क्यों आया हूं ? जिसे इन तीन प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं , वह  विदेह हो जाता है और घड़ी भर जहां रुकता है , वह स्थान उस काल के लिए तीर्थ बन जाता है। ऐसा मनुष्य सिद्ध योगी होता है जिसे तत्त्ववित्  भी कहते हैं। 

ऊपर बताए गए तीन प्रश्न , सांख्ययोग और पतंजलि योग सूत्र दर्शन के आधार हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्र के आधार पर अब हम यहां योग को समझते हैं।

महर्षि पतंजलि कह रहे हैं …

योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:”

~ पतंजलि समाधिपाद सूत्र - 02~

ऐसी क्रियाएं जिनके अभ्यास से चित्त की वृत्तियों का निरोध हो , वे योग कहलाती है पर इतने से योग शब्द के रहस्य से पर्दा नहीं उठता। महर्षि पतंजलि के योग परिभाषा के संबंध में समाधिपाद सूत्र - 01 से पता चलता है कि योग क्या है ? जो निम्न प्रकार है …

“अथ योगानुशासनम् “

' अब योग अनुशासन प्रारंभ होता है ' 

यहां महर्षि योग को अनुशासन कह रहे हैं । अनुशासन दो शब्दों से मिल कर बना है - अनु + शासन। अनु का अर्थ है पहले से और शासन का अर्थ है जीवन जीने का यथार्थ मार्ग।

इस प्रकार समाधिपाद सूत्र :1 एवं सूत्र :2 को एक साथ देखने से जो सार निकलता है , वह निम्न प्रकार है …

 पतंजलि यहां स्पष्ट रूप से कह रहे हैं , यह योग कोई नया नहीं अपितु पहले से चला आ रहा योग है, मैं तो मात्र इसे स्पष्ट कर रहा हूं । अब यहां प्रश्न उठ सकता है कि आखिर जो योग पतंजलि अपनें योग सूत्र दर्शन के माध्यम से बता रहे हैं , उससे चित्त की वृत्तियों का निरोध तो हो जाता है पर इससे होता क्या है ? इस प्रश्न के समाधान के लिए महर्षि पतंजलि समाधिपाद में अगले सूत्र :1.3 और सूत्र:1.4 में कहते हैं ..

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 03 

तदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम् 

अर्थात 

योग माध्यम से  द्रष्टा ( पुरुष ) अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है 

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 04

वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र

वृत्ति स्वरुप जैसा अन्य स्थितियों में 

समाधिपाद सूत्र : 3 और सूत्र :4 का एक साथ भावार्थ देखते हैं ….

योग को छोड़ शेष  स्थितियों में पुरुष , चित्त स्वरूपाकार होता है जो योग सिद्धि मिलने पर अपने मूल स्वरूप में आ जाता है ।

अब ऊपर व्यक्त समाधिपाद सूत्र : 1 - 4 का सार एक साथ देखते हैं 

जो लोग योग में स्थित नहीं होते , उनके अंदर स्थित शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी चित्त स्वरूपाकार होता है। वहीं व्यक्ति जब योग में स्थित होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष यह नहीं समझता कि वह चित्त है अपितु वह अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है । निरंतर योगाभ्यास करते रहने वाले योगी का योग जब सिद्ध होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष चित्त के बंधन से अपनें को मुक्त देखते हुए अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है जिसे कैवल्य कहते हैं ।

पतंजलि योग दर्शन समाधिपाद के प्रारंभिक 04 सूत्रों को ठीक से समझने के लिए योगदर्शन के शेष 191 सूत्रों के साथ सांख्य योग के सार को भी समझना होगा। लेकिन आगे बढ़ने से पहले यह जानलेना आवश्यक है कि चित्त की वृत्तियां क्या हैं? चित्त त्रिगुणी है और तीनों गुणों की अपनी - अपनी वृत्तियों है। सांख्य और योगसूत्र में बुद्धि , अहंकार और मन के समूह को चित्त कहते हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्रों की साधना से तामस एवं राजस गुणों की वृत्तियों का निरोध पहले होता है इस प्रकार जब चित्त केवल सात्त्विक गुणों की वृत्तियों के प्रभाव में रहने लगता है तब निरंतर योगाभ्यास से इन वृत्तियों का भी निरोध हो जाता है और चित्त गुणों की वृत्तियों के मुक्त रहने लगता है जिसे कैवल्य कहते हैं । कैवल्य पाद सूत्र : 34 में कैवल्य की परिभाषा को देखें …

पुरुषार्थ शून्यानाम् गुणानाम् प्रतिप्रसव: कैवल्यम् ।

स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।।

“ पुरुषार्थ का शून्य हो जाना और तीन गुणों की वृत्तियों का निरोध हो जाना , कैवल्य है ।

अब आगे की यात्रा पर निकलते हैं ….

 पतंजलियोग दर्शन में कुल 195 सूत्र हैं और ईश्वरकृष्ण रचित सांख्य दर्शन में 71 कारिकायें हैं जिनमें से आखिरी 3 को छोड़ शेष 68 कारिकाओ का संबंध तत्त्व ज्ञान से है जो प्रारंभ उठाए गए तीन प्रश्नों का हल देते हैं ।

सांख्य दर्शन और पतंजलियोग सूत्र दर्शन एक दूसरे के पूरक दर्शन हैं। सांख्य दर्शन सिद्धांत देता है , सिद्धांत की सिद्धि प्राप्ति के उपाय स्वरूप योग का पूरा विज्ञान , महर्षि पतंजलि देते हैं। अतः बिना सांख्य दर्शन समझे ,पतंजलियोग सूत्र दर्शन को नहीं समझा जा सकता और बिना पतंजलि योगदर्शन ,सांख्य के सिद्धांतों की सिद्धि प्राप्त करना भी संभव नहीं। 

सांख्य दर्शन , मैं कौन हूं की जिज्ञासा के समाधान का सिद्धांत देता है। सांख्य कहता है , त्रिगुणी , सनातन , स्वतंत्र , प्रसवधर्मी एवं जड़ तत्त्व प्रकृति एवं निर्गुणी , स्वतंत्र , सनातन एवं शुद्ध चेतन तत्त्व पुरुष के संयोग से सृष्टि है । पुरुष प्रकाश के प्रभाव में त्रिगुणी जड़ प्रकृति विकृत होकर बुद्धि , अहंकार , मन , 10 इंद्रियों, 5 तन्मात्र और 5 महाभूतों को उत्पन्न करती हैं। इन 23 तत्त्वों में प्रारंभिक तीन तत्त्वों ( बुद्धि , अहंकार , मन ) के समूह को चित्त कहते हैं, जैसा पहले भी बताया जा चुका है । प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व हैं क्योंकि इनका कारण मूल प्रकृति ( तीन गुणों की साम्यावस्था ) भी त्रिगुणी एवं जड़ हैं अतः कारण - कार्य सिद्धांत के आधार पर प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ होते हैं। प्रकृति - पुरुष संयोग होते ही शुद्ध चेतन पुरुष चित्त केंद्रित हो कर चित्त जैसा बन जाता है अर्थात शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी जड़ तत्त्व बन जाता है और प्रकृति पुरुष प्रकाश के प्रभाव में यह समझने लगती है कि उसे क्या करना है।

यहां एक गहरी शिक्षा मिलती है । जड़ की संगति में चेतन भी जड़ बन जाता है लेकिन चेतन की संगति में जड़ चेतन जैसा व्यवहार करने लगता है। जब आप किसी की संगति में हैं तो अपनी स्थिति को समझने की कोशिश अवश्य करें ।

 पुरुष ,प्रकृति के 23 तत्त्वों के माध्यम से भोग से मिलने वाले सुख और दुःख की अनुभूति करता है और प्रकृति के 23 तत्त्व उसे इस कार्य में मदद करते हैं। प्रकृति जानती है कि पुरुष को अपने मूलभस्वरूप में लौटना है और जब वह अपने मूल स्वरूप में लौटेगा तब मैं भी अपने मूल स्वरूप में आ जाऊंगी । भोग अनुभव से पुरुष को वैराग्य होता है। वह प्रकृति के प्रति उदासीन हो जाता है और अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है। जब ऐसा होता है तब इसी के साथ-साथ प्रकृति के 23 तत्त्व अपनें - अपनें कारणों में लीन हो जाते हैं और अंततः बुद्धि प्रकृति में लीन हो जाती है और विकृति प्रकृति अपनें मूल स्वरूप (तीन गुणों की साम्यावस्था) में आ जाती है। पुरुष और प्रकृति दोनों अपने - अपनें मूल स्वरूप में निष्क्रिय होते हैं। 

पतंजलि योगसूत्र आधारित योगाभ्यास की सिद्धि से चित्त की वृत्तियां शांत हो जाती है । वैराग्य की ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है । पुरुष प्रकृति का बोध हो जाता है और यही बोध कैवल्य है जिसकी प्राप्ति से आवागमन से मुक्ति मिल जाती है जिसे मोक्ष कहते हैं।

~~ ॐ ~~

Tuesday, February 3, 2026

उपनिषद् रहस्य


मुक्तिका उपनिषद् 

मुक्तिका उपनिषद् मध्यकालीन संभवतः 10वीं से 17वीं शताब्दी के बीच की मानी जाती है और कुछ विद्वान इसे दाराशिकोह के फारसी अनुवाद से  पहले का मानते हैं।

दारा शिकोह 1615 में पैदा हुआ और मुग़ल साम्राज्य के प्रसिद्ध शहंशाह शाहजहाँ और मुमताज़ महल का सबसे बड़ा पुत्र था । यह अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था। दारा शिकोह को एक विद्वान, दार्शनिक और सूफ़ी विचारधारा में गहरी रुचि रखने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। उसने इस्लाम और हिंदू धर्म के बीच साम्य स्थापित करने का प्रयास किया, जिसके लिए उसने संस्कृत ग्रंथों जैसे उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया। उसकी प्रसिद्ध रचना सिर्र-ए-अकबर (रहस्यमय रहस्य) और मजमा-उल-बहरैन (दो समुद्रों का मिलन) इस्लामी सूफ़ीवाद और हिंदू वेदांत दर्शन के बीच तालमेल को दर्शाती है। सत्ता के संघर्ष में उसका छोटा भाई औरंगज़ेब उससे आगे निकल गया। 1658 में समुगढ़ का युद्ध हारने के बाद, दारा शिकोह को गद्दी से वंचित कर दिया गया और 1659 में औरंगज़ेब के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई थी। दारा शिकोह को सन 1640 में कश्मीर की यात्रा के दौरान उन्हें पहली बार उपनिषदों के बारे में पता चला। इन ग्रंथों की दार्शनिक गहराई  उन्हें अचंभित कर दिया।  

दारा सन1654 में बनारस के संस्कृत पंडितों को दिल्ली बुलाकर उपनिषदों का फारसी मेंअनुवाद कराने का कार्य शुरू किया  और 1657 में 50 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में तैयार अनुवाद को सिर्र-ए-अकबर (The Great Secret) नामक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित करवाया। यह अनुवाद यूरोप पहुँचा, लैटिन में इसका अनुवाद हुआ जो आर्थर शॉपेनहावर जैसे अनेक दार्शनिकों को

 प्रभावित किया । आर्थर शॉपेनहावर जैसे दार्शनिकण उपनिषदों को "जीवन की सांत्वना" बताया।

मुक्तिका उपनिषद् एक महत्वपूर्ण उपनिषद है, जो 108 उपनिषदों की आधिकारिक और सर्वमान्य सूची प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध है। यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित मानी जाती है और यह सामान्य उपनिषदों की श्रेणी में आती है।

मुख्य विशेषताएँ

यह एक संवाद रूप में है, जिसमें भगवान श्रीराम अपने परम भक्त हनुमान जी को मोक्ष (मुक्ति) का मार्ग और उपनिषदों का ज्ञान देते हैं। इसलिए इसका नाम मुक्तिका (मोती या मुक्ति का प्रतीक) पड़ा है। इसमें कुल लगभग 125 श्लोक (या मंत्र) हैं, जो निम्न प्रकार दो अध्यायों में विभाजित हैं….

प्रथम अध्याय (करीब 49 श्लोक )

मुक्ति के विभिन्न प्रकारों (जैसे क्रम मुक्ति, सद्य मुक्ति, जीवन्मुक्ति, विदेह मुक्ति) का वर्णन, और कैवल्य मुक्ति (पूर्ण अद्वैत ज्ञान से मुक्ति) को सर्वोच्च बताना।

द्वितीय अध्याय (करीब 76 श्लोक)

108 उपनिषदों की विस्तृत सूची, उनके वेदों से संबंध और वर्गीकरण (मुख्य, सामान्य, योग, संन्यास, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि)।

मुक्तिका उपनिषद् का मुख्य सार

मुक्ति का एकमात्र सच्चा प्रकार: कैवल्य (पूर्ण अद्वैत ज्ञान से आत्मा का ब्रह्म में लीन होना)।

राम जी कहते हैं कि इन 108 उपनिषदों का अध्ययन (श्रवण, मनन, निदिध्यासन) करने से पाप नष्ट होते हैं, और एक बार सुनने मात्र से भी मुक्ति का मार्ग खुलता है।

मांडूक्य उपनिषद् का विशेष महत्व: राम जी कहते हैं कि यदि केवल मांडूक्य उपनिषद् (और उसकी गौडपाद कारिका) का पूर्ण ज्ञान हो जाए, तो भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

ये 108 उपनिषद् सभी वेदों के सार हैं और इन्हें गुरु से पढ़कर जीते जी मुक्ति और अंत में विदेह मुक्ति प्राप्त होती है।

मुक्तिका उपनिषद् उपनिषदों का "कैनन" या निर्देशक ग्रंथ है। यह बताता है कि मुक्ति के लिए ज्ञान मार्ग (वेदांत) सर्वोत्तम है, और इन 108 उपनिषदों का अध्ययन मोक्ष का सीधा साधन है। 

मुक्तिका उपनिषद् ही वह एकमात्र ग्रंथ है जो 108 उपनिषदों की पूरी सूची देता है, जो सर्वमान्य है। ये चार वेदों में निम्न प्रकार विभाजित हैं…

ऋग्वेद > 10 उपनिषद् , शुक्ल यजुर्वेद >19 उपनिषद्

कृष्ण यजुर्वेद > 32 उपनिषद् , सामवेद > 16 उपनिषद्

अथर्ववेद > 31 उपनिषद् ।

इन 108 उपनिषदों में प्रमुख 10 उपनिषद् निम्न हैं …

ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक । इनका भाष्य आदि शंकराचार्य जी द्वारा लिखा गया है और इन्हें देशोपनिषद् कहते हैं। इनके बारे में अगले अंक में चर्चा होगी ।

।।।। ॐ।।।।

Wednesday, December 31, 2025

पञ्च केदार तीर्थ यात्रा भाग - 1 परिचय


पञ्च केदार दर्शन 

भाग : 01 परिचय

पञ्च केदार दर्शन के अंतर्गत श्री केदारनाथ धाम , श्री मध्यमहेश्वर , श्री तुंगनाथ जी , श्री रुद्रनाथ जी और श्री कल्पेश्वर महादेव जी दर्शन यात्रा से साथ श्री बूढ़ा केदार जी की दर्शन तीर्थ यात्रा भी की जाने वाली है। इस शिव यात्रा में पहली यात्रा श्री केदारनाथ जी को होने वाली है, लेकिन पहले निम्न को भी समझ लेते हैं …

शैव मान्यता में शिव एवं मां पार्वती के पुत्र रूप में विष्णु को बताया गया है। शिव का मूल स्थान कैलाश है जिसे सृष्टि का आधार भी माना जाता है। श्री केदारनाथ धाम यात्रा प्रारंभ करने से पहले पञ्च केदार के संबंध में कुछ मूल बातों को भी समझ लेते हैं …

1- पञ्च केदारों की भौगोलिक स्थिति 

ऊपर उत्तराखंड मानचित्र पर पञ्च केदारों की भौगोलिक स्थिति को दिखाया गया हैं। पञ्च केदारों में केदारनाथ, मध्यमहेश्वर एवं तुंगनाथ,रुद्रप्रयाग जनपद में और रुद्रनाथ एवं कल्पेश्वर चमोली जनपद में हैं। 

पञ्च केदारों के एक यात्रा में दर्शन करने के कई विकल्प हैं जिनमें से यहां हरिद्वार से ऊखीमठ और ऊखीमठ से पांच केदारों की तीर्थ यात्रा को निम्न दो स्लाइड्स में माध्यम से स्पष्ट करने का यत्न किया जा रहा है। इन स्लाइड्स में स्थानों की समुद्रतल से ऊंचाई मीटर में और उनके बीच की दूरी  km में दी गई हैं। हरिद्वार से ऊखीमठ लगभग 208 km है जो वाहन से की जा सकती है ।

2- हरिद्वार से ऊखीमठ यात्रा में पड़ने वाले तीर्थों , उनके बीच की दूरी और उनका समुद्रतल से ऊंचाई 


श्री केदारनाथ जी और श्री मध्यमहेश्वर जी की शीत कालीन निवास स्थल ऊखीमठ का श्री ओंकारेश्वर मंदिर है। नीचे स्लाइड में ऊखीमठ से पञ्च केदारों की वाहन से एवं पैदल यात्राओं की दूरी को दिखाया जा रहा है।

3- ऊखीमठ मोड़ ( कुण्ड ) से पञ्च केदारों की दूरी 

4- केदारनाथ से बूढ़ा केदार की तीर्थ यात्रा और पञ्च केदार का महाभारत से संबंध 

पञ्च केदार के अलावा टिहरी - गढ़वाल जनपद में श्री केदारनाथ धाम से लगभग 72 km की  दूरी पर एक बूढ़ा केदार तीर्थ भी है जो घनसाली तहसील में बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम के करीब स्थित है। यहां पांडवों को शिव वृद्ध रूप में दर्शन दिए थे। वृद्ध केदार क्षेत्र के लोग केदारनाथ की यात्रा नहीं करते,वृद्ध केदार दर्शन ही उनके लिए परम तीर्थ है। नीचे केदारनाथ से बूढ़ा केदार का ट्रैक मैप दिया जा रहा है ( ग्रोक के प्राप्त ) ।


पांच केदार एवं बुढ़ा केदार का संबंध पांडवों के है, आइए ! देखते हैं , इस संबंध में महाभारत की एक कथा सार को …

पांडव भाइयों का 13 वर्ष का बनवास था जिसमें आखिरी एक वर्ष गुप्त रहने का बनवास था। इस 13 वर्षों में बूढ़ा केदार में पांडवों को बूढ़े शिव के दर्शन हुए थे। बनवास के पूरा होने के कुछ दिनों बाद महाभारत युद्ध हुआ। लगभग 36 वर्ष राज्य करने के बाद पांडव परीक्षित को सम्राट बना कर स्वर्गारोहिणी हिमालय यात्रा पर निकल गए थे। इसयात्रा से पञ्च केदार तीर्थों का गहरा  संबंध है।

पञ्च केदार तीर्थ यात्रा महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा पर आधारित है, जो भगवान शिव और पांडवों के बीच हुए घटनाक्रम से संबंधित है। यह कथा पांडवों द्वारा गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाने की इच्छा और भगवान शिव की परीक्षा से जुड़ी है, आइए, देखते हैं , इस कथा के सार को …

1. महाभारत युद्ध के बाद, पांडवों को अपने ही परिजनों की हत्या का पश्चाताप होता था। वे गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सलाह दी कि इस पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की शरण में जाएं ।

2. पांडव भगवान शिव से मिलने काशी (वाराणसी) गए, लेकिन शिव पांडवों से नाराज थे और उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे ,इसलिए वे अंतर्ध्यान होकर हिमालय के केदार क्षेत्र में चले गए।

3. पांडवों के हिमालय तक पीछा करने पर, भगवान शिव ने अपना रूप बदलकर एक बैल का रूप धारण कर लिया। जब पांडवों ने उन्हें पहचान लिया, तो शिव भूमिगत होने लगे। भीम ने तेजी से दौड़कर बैल की पीठ (कूबड़) पकड़ ली जिसके कारण  शिव का धड़ भूमि के ऊपर ही रह गया ।

4. भगवान शिव के बैल रूप के पांच अंग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए , जिसके संबंध में नीचे बताय गया है।    1. केदारनाथ: शिव का धड़ (कूबड़) यहाँ प्रकट हुआ ।

   2.मद्महेश्वर: शिव की नाभि यहाँ प्रकट हुई ।

   3.तुंगनाथ: शिव की भुजाएँ यहाँ प्रकट हुईं ।

   4.रुद्रनाथ: शिव का मुख यहाँ प्रकट हुआ ।

   5.कल्पेश्वर: शिव की जटाएँ यहाँ प्रकट हुईं ।

5. भगवान शिव ने पांडवों को दर्शन देकर उन्हें गोत्रहत्या के पाप से मुक्त किया। इसके बाद, शिव इन स्थानों पर स्थायी रूप से विराजमान हो गए ।

इस के बाद पांडव बद्रीनाथ , माणा गांव और बसुधारा झरना से होते हुए चक्रतीर्थ , सतोपंथ और स्वर्गारोहिणी की यात्रा किए थे । द्रोपदी तथा युधिष्ठिर को छोड़ शेष चार पांडव 

सतोपंथ झील तक देहत्याग चुके थे,केवल युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग की यात्रा कर पाए थे। 

बद्रीनाथ - सतोपंथ की दूरी लगभग 30-35 km है।

अगले अंक में केदार घाटी और केदारनाथ धाम से संबंधित रहस्यों को देखा जा सजेगा …

~~ ॐ ~~