Saturday, November 7, 2026

गीता श्लोक 2.28


श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 2.28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्तनिधनानि एव तत्र का परिदेवना।। गीता 2.28।।

यह श्लोक सम भाव योग सिद्ध योगी की ओर इशारा कर रहा है जो समभाव में स्थित होता है । अब श्लोक को समझते हैं।


 सभी भूत अव्यक्त थे ,अव्यक्त की ओर बढ़ रहे है, केवल वर्तमान में व्यक्त हैं अर्थात…

संसारके वर्तमान व्यक्त दृश्य वर्ग अव्यक्त से व्यक्त हुए हैं और सभी व्यक्त की आगे की यात्रा भी अव्यक्त हो है।

इस अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से पुनः अव्यक्त हो जाने की स्थिति में किसी के अव्यक्त हो जाने पर शोक क्या करना ! यह श्लोक भूतों के निम्न  जीवन चक्र जिसे आवागमन चक्र भी कहते हैं , की ओर ध्यान आकर्षित करता है …

।। जन्म ~>जीवन~> मृत्यु ~> जन्म ~> जीवन ~> मृत्यु ।।

इस आवागमन चक्र के मुक्ति उन्हें मिलती है जो स्थिरप्रज्ञ, गुणातीत और पुरुषार्थ शून्य सिद्ध योगी हैं। ऐसे योगी दुर्लभ होते हैं ।

प्रभु श्री कृष्ण का यह श्लोक , वैराग्य - बीज है जो कैवल्य का द्वार दिखाता है । ऐसी स्थिति प्राप्त करना कैसे संभव है? इसके लिए गीता में कुछ और तैरते हैं।

गीता अध्याय - 1 में 47 श्लोक हैं जिनमें 22 श्लोक अर्जुन के हैं और प्रभु श्री कृष्ण का कोई श्लोक नहीं है।अध्याय - 1 में अर्जुन वक्ता हैं और प्रभु श्री कृष्ण श्रोता । अध्याय - 1 मे अर्जुन के 22 श्लोकों में कही गई बातों को सुनने के बाद प्रभु श्री कृष्ण श्लोक - 2.2 में कहते हैं , अर्जुन ! यह असमय में तुझे मोह कैसे हो गया ? प्रभु का यह निष्कर्ष की तुम मोह के दलदल में डूब रहे हो, अर्जुन की बातों का सार है जिसे अर्जुन स्वयं नहीं समझ पा रहे। ऐसा हम - आप के साथ भी प्रतिदिन घटित होता रहता है। मनुष्य अपनी कही गई बात को तो समझता नहीं , दूसरों को समझाने में अपने को व्यस्त रखता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 700 श्लोक हैं जिनमें 574 श्लोक प्रभु श्री कृष्ण के हैं। युद्ध प्रारंभ होने से पहले अर्जुन को मोहमुक्त देखना चाहते हैं क्योंकि मोह ऊर्जा को क्षीण करती है और दुर्बल व्यक्ति युद्ध में भला जीत कैसे सकता है!

अध्याय - 2 में कुल 72 श्लोकों में 63 श्लोक प्रभु के हैं और इनमें से 13 श्लोकों का सीधा संबंध ज्ञानयोग के केंद्र आत्मा  से है । इसी अध्याय में 18 श्लोक स्थिर प्रज्ञ से भी संबंधित हैं। स्थिर प्रज्ञता से आत्मा का बोध होता है।


प्रभु श्री कृष्ण गीता में अपने 574 श्लोकों के माध्यम से अर्जुन की आसक्ति , कामना , काम , क्रोध , लोभ , मोह , भय , आलस्य , अहंकार आदि कर्म बंधनों  से मुक्त करा कर उसके प्रवृत्ति परक कर्म को निवृत्ति परक कर्म में बदल कर , वैराग्य में स्थित कर ज्ञान योग में प्रवेश कराना चाहते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 श्लोक 49 - 50 में प्रभु कहते हैं……

आसक्ति रहित कर्म से नैष्कर्म्य की सिद्धि मिलती है जो ज्ञानयोग की परानिष्ठा है ।

प्रभु श्री कृष्ण अपने 574  श्लोकों में जो कुछ भी कहें हैं , उनका सार ऊपर व्यक्त श्लोक 18.49 - 18.50 में व्यक्त किए हैं। प्रारंभ में दिए गए श्लोक - 2.28, समत्वयोग की पराकाष्ठा है जो  कैवल्यके द्वार है।

प्रभु श्री कृष्ण गीता में  उपासक अर्जुन को युद्ध उपासना के माध्यम से उपास्य से एकत्व स्थापित कराना चाहते हैं। 

गीता , महाभारत का अंग है। यदि आप महाभारत सार को अपने स्मृति में संचित कर रखे हों तो आप जानते होंगे कि पांडव महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर में राज्य किए जहां कर्म से कर्मयोग , कर्मयोग से वैराग्य और वैराग्य में ज्ञान अर्जित कर तपस्वियों का भेष धारण कर राज्य परीक्षित को दे कर आरण्य गमन किए थे। वर्षो आरण्य में वैरागी जीवन जीने के बाद स्वर्गारोहिणी यात्रा में स्वयं को परम सत्य में लीन कर दिए थे। 

अर्जुन, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं के मध्य प्रभु श्री कृष्ण के 574  श्लोक से जो ज्ञान - बीज प्राप्त किए , वह बीज अंकुरित हुआ हस्तिनापुर में और उसका फल स्वर्गारोहिणी यात्रा के रूप में दिखा।

तीर्थ , शास्त्र , सत्गुरु वैराग्य का बीज डालते हैं जो गृहस्थ जीवन में अंकुरित होते हैं , धीरे - धीरे वृक्ष बन जाता है। जब 40 वर्ष के ऊपर की उम्र होने लगती है तब वह तीर्थ सेवन , शास्त्र सेवन और सत्गुरु की उपासना का वृक्ष में वैराग्य नामक फल दिखने लगते हैं और  

तब ? 

वह वैरागी गृहस्थ प्रकृतिलय संन्यासी जैसा विदेह की भांति स्वेच्छा से अपना पञ्च भूतीय शरीर का त्याग कर देता है। इसे कैवल्य कहते हैं । ऐसा उपासक आवागमन से मुक्त हो जाता है।

~~।।हरे कृष्ण।।~~


Wednesday, October 7, 2026

परमहंस श्री रामकृष्ण जी कथा - 01


परमहंसजी

कथा - 01

कंचन और कामिनी आसक्ति

परमहंस श्री रामकृष्ण जी प्रायः अपने प्रवचनों में कंचन - कामिनी ( धन और स्त्री ) आसक्ति को ईश्वरानुभूति मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट बताया करते  थे।एक दिन विवेकानंदजी सोचे, क्या वास्तव में इस आसक्ति से ये मुक्त हैं? इस संदेह में विवेकानंद एक दिन परमहंस जी के बिस्तर में एक रुपए का सिक्का छिपा दिए। जब परमहंस जी बिस्तर पर लेटे तब लेटते ही उछलने लगे और रोने लगे। विवेकानंद जी इस घटना को देख रहे ही थे, वे तुरंत दौड़े हुए आए और परमहंस जी को उठा कर, बिस्तर को झाड़ने लगे। बिस्तर झाड़ते ही उनके द्वारा छिपाता गया एक रुपए का सिक्का नीचे गिर पड़ा। विवेकानंद जी परमहंस जी की ओर देखे और उनकी नम आँखें स्वयं झुक गई(🥲).

 ऐसी ही परीक्षा एक बार  माथुर बाबू ( दक्षिणेश्वर के प्रधान और रानी रासमणि के दामाद) भी लिए थे। परमहंस जी की परीक्षा लेने के लिए माथुरबाबू एक बार

कोलकाता की एक मशहूर वैश्या को उनके पास भेजा था। परमहंस जी उसे देखते ही बोले, अरे, मां तुम आ गई! मैं तेरा ही इंतजार कर रहा था और सोच रहा था कि तूं जरूर आएगी। उसे अपने पास बैठाए और उसकी गोदी में एक छोटे बच्चे की भांति बैठ गए। वह वैश्या तो घबड़ा गई। परमहंस जी उसकी गोदी में बैठते ही समाधिस्थ हो गया। तब क्या था !  वह वैश्या घबड़ा गई और चिल्लाने लगी,उनकी चिल्लाने की आवाज सुन माथुरबाबू अपने कुछ नौकरों के साथ भागे - भागे वहां पहुंचे और उस वैश्या से बोले , घबड़ाएं नहीं , ऐसा होना ही था। कुछ घड़ी बाद परमहंस जी की समाधि खंडित हुई और वे रोने लगे। रोते - रोते बोल रहे थे , मां! मैं तो वहीं ठीक था , मुझे यहां क्यों भेज दिया ? 

~ ॐ ~


Thursday, July 23, 2026

सांख्य दर्शन में दो प्रकार की तत्त्व सृष्टि

सांख्य दर्शन में भाव सृष्टि और लिंग सृष्टि रहस्य 

“भाव सृष्टि के बिना,लिंग सृष्टि का और लिंग सृष्टि के बिना भाव सृष्टि का कोई प्रयोजन नहीं ,दोनों एक दूसरे के पूरक हैं “

भाव सृष्टि को बुद्धि सृष्टि और लिंग सृष्टि को भौतिक सृष्टि भी कहते हैं। लिंग सृष्टि में इंद्रिय विषय (तन्मात्र) एवं पांच भूतों से निर्मित माता - पिता संयोग से प्राप्त स्थूल देह का निर्माण होता है। लिंग सृष्टि के 10 तत्त्वों के आश्रित रहने वाले तत्त्व – बुद्धि , अहंकार और इंद्रियों की उत्पत्ति , भाव सृष्टि है अतः भाव सृष्टि और लिंग सृष्टि को अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। 

अब ऊपर दिए गए सार की स्मृति में निम्न स्लाइड पर ध्यान केंद्रित करें ⤵️ 

1- भाव या बुद्धि सृष्टि

प्रकृति - पुरुष संयोग के फलस्वरूप बुद्धि की निष्पति है। बुद्धि से अहंकार (सात्त्विक+राजस+तामस) की उत्पत्ति है। अहंकार में सात्त्विक अहंकार से 11 इंद्रियों की निष्पति है। 

बुद्धि , अहंकार और 11 इंद्रियां ही भाव सृष्टि  हैं।


2- लिंग सृष्टि

 पञ्च तन्मात्र और पञ्च महाभूत - ये 10 तत्त्व लिंग सृष्टि हैं। यहां ध्यान रखना होगा कि पञ्च  तन्मात्रों का कारण तत्त्व तामस अहंकार है जो भाव सृष्टि का तत्त्व है और पञ्च  तन्मात्र , पञ्च महाभूतों के कारण तत्त्व हैं। महाभूतों से माता - पिता संयोग से प्राप्त स्थूल देह है । 

भाव सृष्टि के तामस अहंकार तत्त्व की अनुपस्थिति में पञ्च तन्मात्रों का होना संभव नहीं और जब तन्मात्र नहीं होंगे तब उनके महाभूतों का भी होना संभव नहीं क्योंकि तन्मात्र , महाभूतों के कारण तत्त्व हैं और बिना कारण , कार्य का होना संभव नहीं अतः भाव सृष्टि के बिना लिंग सृष्टि का होना संभव नहीं। 

भाव सृष्टि के 13 तत्त्व (बुद्धि +अहंकार+मन+10 इंद्रियां) अति सूक्ष्म तत्त्व हैं, इन्हें आश्रय चाहिए जिसके सहयोग से ये कार्य कर सकें और यह आश्रय स्थूल देह है। स्थूल देह माता - पिता संयोग से पञ्च महाभूतों से निर्मित है तथा पञ्च महाभूतों की निष्पति पञ्च तन्मात्रों से है। पञ्च  तन्मात्र , तामस अहंकार से उत्पन्न है और तामस अहंकार,भाव सृष्टि का तत्त्व है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि भाव सृष्टि के तामस अहंकार तत्त्व से लिंग सृष्टि का अस्तित्व है।

भाव सृष्टि के बिना लिंग सृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं और बिना लिंग सृष्टि , भाव सृष्टि का कोई प्रयोजन नहीं।

भाव ( बुद्धि ) सृष्टि के 13 तत्त्वों ( महत्+अहंकार+मन

+10 इंद्रियां) को करण भी कहते हैं ( देखें कारिका : 32+33) । इनमें महत् (बुद्धि),अहंकार एवं मन को अंतःकरण और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं।

सात्त्विक,राजस और तामस गुणों के आधार पर अहंकार 03 प्रकार का होता है। ऊपर व्यक्त 13 तत्त्वों में महत् (बुद्धि) तत्त्व प्रकृति का कार्य है और अहंकार बुद्धि का कार्य है। सात्त्विक अहंकार के कार्य मन और 10 इंद्रियां हैं। कारण वे तत्त्व कहलाते हैं जिनसे कोई और तत्त्व की उत्पत्ति होती है। कारण तत्त्व से उत्पन्न होने वाले तत्त्व को उस कारण का कार्य कहते हैं । सांख्य दर्शन में कारण - कार्य सिद्धांत एक प्रमुख सिद्धांत हैं ( देखें कारिका - 09 )।


अंतःकरण तीनों कालों के बिषयों को ग्रहण करते हैं जबकि बाह्य करण केवल वर्तमान काल के बिषयों को ग्रहण करते हैं।


लिंग शरीर या सुक्ष्म शरीर (Cosmic Body)

बुद्धि,अहंकार,मन,10 इंद्रिय और 05 तन्मात्रों , इन 18 तत्त्वों के समूह को लिंग शरीर कहते हैं। बुद्धि , अहंकार और मन को चित्त या अंतःकरण कहते हैं।

 प्रकृति - पुरुष संयोग में पुरुष चित्त केंद्रित हो जाता है और चित्त स्वरूपाकार बन जाता है अर्थात

 जड़ एवं त्रिगुणी चित्त के साथ होने से शुद्ध चेतन एवं निर्गुणी पुरुष , सगुणी जैसा व्यवहार करने लगता है।

 चित्त केंद्रित पुरुष प्रकृति के 23 तत्त्वों को अपने त्रिगुणी भोग के लिए उपकरणों की भांति प्रयोग करता है।चेतन पुरुष अब त्रिगुणी जड़ (अज्ञानी)  की संगति में त्रिगुणी जड़ (अज्ञानी) जैसा दिखने लगता है। चित्त केंद्रित पुरुष त्रिगुणी भोगों का भोक्ता बन कर उनसे मिलने वाले सुख और दुःख का भोक्ता बन जाता है।

निरंतर त्रिगुणी भोग भोगते रहने के अनुभव से जब उसे वैराग्य हो जाता है तब वह अपने मूल स्वरूप में लौटता है और प्रकृति से अलग हो जाता है अर्थात अब वह प्रकृति के प्रति आसक्त नहीं रहता । पुरुष जा वैराग्य उसे अपने मूल स्वरूप में स्थित कर देता है और इसे की कैवल्य कहते है। तीन गुणों का प्रति प्रसव होना तथा चित्ताकार पुरुष का अपने नील स्वरूप में तीर होना ही कैवल्य है ( देखे पतंजलि कैवल्य पाद सूत्र : 34) ⤵️

पुरुषार्थ शून्यानाम् गुणानाम् प्रतिप्रसव: कैवल्यम् ।

स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।। कैवल्यपाद :34।।

जबतक पुरुष को कैवल्य नहीं मिल जाता तबतक प्रकृति लिंग शरीर के माध्यम से स्थूल देह में आवागमन करती रहती है और इसी को पुनर्जन्म भी कहते हैं।

 कैवल्य के साथ विकृति प्रकृति के 23 तत्त्व अपने - अपने कारणों में लीन हो जाते हैं। अंततः बुद्धि का प्रकृति में लय हो जाता है और विकृत प्रकृति अपने मूल स्वरूप में आ जाती है जो तीन गुणों की साम्यावस्था है।

प्रकृति - पुरुष संयोग से भाव सृष्टि एवं लिंग सृष्टि की निष्पति तथा 18 तत्त्वों वाले लिंग शरीर माध्यम से प्रकृति का आवागमन में तबतक बने रहना जबतक पुरुष को कैवल्य नहीं मिल जाता, तक की सांख्य दर्शन - यात्रा यहीं पर कुछ घड़ी विश्राम करती हैं । आगे की यात्रा , अगले अंक में ।

~~ सांख्य दर्शन ~~


Sunday, May 17, 2026

सांख्य दर्शन में बुद्धि अहंकार एवं मन समीकरण

सांख्य कारिका : 31

बुद्धि , अहंकार और मन समीकरण

स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूत हेतुकाम् वृत्तिम्।

पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित्कार्यते करणम्।। 31।।

सारांश

यह कारिका सांख्य दर्शन के मूल सिद्धांत - सृष्टि , प्रकृति - पुरुष संयोग का फल है जिसका प्रयोजन पुरुषार्थ है , की ओर इशारा कर रही है।

बुद्धि , अहंकार एवं मन समीकरण

👉13 करण परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय के आधार पर अपनीं - अपनीं वृत्तियों को धारण करते हैं । उन सभी वृत्तियों का पुरुषार्थ ( मोक्ष ) ही उद्देश्य है और ये करण स्वयं ही प्रवृत्त होते हैं , किसी से नियंत्रित होकर नहीं प्रवृत्त होते । 

 पुरुषार्थ क्या है ?

 त्रिगुणी,जड़ एवं अचेतन प्रकृति और निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष के संयोग का फल, सृष्टि- निष्पति है। त्रिगुणी भोग एवं भोग से मिलने वाले सुख - दुःख की अनुभूति के लिए पुरुष , प्रकृति से संयोग करता है।

 प्रकृति पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में जड़ होते हुए भी चेतन जैसा व्यवहार करने लगती है और वह सोचती है कि अनुभव प्राप्ति के साथ  पुरुष को अपनें मूल स्वरूप में लौट जाना चाहिए जिसे मोक्ष या कैवल्य कहते हैं।

 प्रकृति अपनें इस सोच के आधार पर पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में विकृत हो कर  23 तत्त्वों ( 13 करण , 05 तन्मात्र एवं 05 महाभूतों) की उत्पत्ति करती है। इन 23 तत्त्वों में प्रारंभिक 03 तत्त्वों (बुद्धि , अहंकार और मन , जिन्हें अंतःकरण या चित्त कहते हैं)  में पुरुष केंद्रित रहते हुए त्रिगुणी पदार्थों का सेवन करता है और उनसे मिलने वाले सुख - दुःख को 

भोगता है। भोगके गहरे अनुभव से उसे इस भोग से वैराग्य प्राप्त हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह अपने मूल स्वरूप में लौट आता है जिसे कैवल्य कहते हैं  । पुरुष द्वारा त्रिगुणी पदार्थों का भोग करना और भोग अनुभव से मुक्त हो जाना ही पुरुषार्थ ( पुरुष का प्रयोजन ) कहलाता है।

कारिका के शब्दों का अर्थ 

स्वां स्वां > अपनी-अपनी, प्रतिपद्यन्ते > प्राप्त करती/करते हैं, ग्रहण करती/करते हैं,परस्पर > एक-दूसरे के,

आकूत > आकांक्षा, इच्छा, उद्देश्य,हेतुकाम् > हेतु (कारण) वाली, प्रेरित,वृत्तिम् > वृत्ति (क्रिया, कार्य, प्रवृत्ति),

पुरुषार्थ > पुरुष का प्रयोजन (भोग और अपवर्ग),

एव > ही,हेतु: > कारण, हेतु,न > नहीं,केनचित् > किसी भी (बाहरी) के द्वारा,कार्यते > कराया जाता है, प्रेरित किया जाता है, करणम् > करण (13 करण : बुद्धि , अहंकार , मन और 10 इंद्रियां) ।

कारिका का हिंदी भावार्थ

पुरुषार्थ (पुरुष के भोग एवं मोक्ष ) प्राप्ति के लिए बिना किसी बाहरी शक्ति के प्रभाव में आए स्वतंत्र रूप से 13 करण अपनी-अपनी वृत्तियों को एक-दूसरे के अभिप्राय कॉन्समझते हुए अपनी - अपनी वृत्तियों को धारण करते हैं।

विस्तृत व्याख्या

सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि, अहंकार, मन और दस इन्द्रियाँ (कुल 13 करण) स्वयं त्रिगुणी एवं अचेतन हैं पर पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में चेतन जैसे दिखते हैं । ये 13 करण आपस में  मिलकर एक-दूसरे की प्रेणना के आधार पर कार्य करते हैं तथा अपनी-अपनी विशेष वृत्ति को धारण करते हैं। इनकी क्रियाओं का अंतिम उद्देश्य पुरुष को त्रिगुणी पदार्थों का भोग कराना , उनसे प्राप्त सुख-दुःख का अनुभव कराना और अंत में अपवर्ग (मुक्ति) दिलाना है। प्रकृति जनित 13 करण बाहरी शक्ति द्वारा नहीं चलाए जाते अपितु इनका संचालन प्रकृति के गुणों और पुरुष के प्रयोजन के कारण स्वाभाविक रूप से होता है।

करण का अर्थ: कार्य करना/कार्य करने वाला।

सांख्य दर्शन में 13 करण हैं, जैसा ऊपर बताया गया है। इनमें बुद्धि , अहंकार और मन को अंतःकरण या चित्त कहते हैं और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं।

03 अंतः करणों की वृत्तियां

1. बुद्धि (महत् तत्त्व) की वृत्ति

निश्चय करना, निर्णय लेना, निष्कर्ष निकालना, विवेकपूर्वक समझना। 

बुद्धि के कार्य — इन्द्रियों और मन से आने वाली सूचनाओं को व्यवस्थित करके निश्चित रूप देना।

बुद्धि की अन्य सहायक वृत्तियाँ

धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (सात्विक भाव) तथा अधर्म , अज्ञान , राग एवं अनेश्वर्य (तामसिक भाव )।

2. अहंकार की वृत्ति: अभिमान 

3. मन की वृत्ति:

 सोचना, कल्पना करना, इच्छा करना, संदेह करना, एक विषय से दूसरे विषय पर घूमना।

मन इन्द्रियों से प्राप्त सूचनाओं को इकट्ठा करता है और उन्हें बुद्धि तक पहुँचाता है। यह संकल्प (हाँ/करना) और विकल्प (नहीं/न करना) के बीच दोलन करता रहता है।

~~ॐ~~

Friday, May 8, 2026

सांख्य दर्शन के 25 तत्त्व


सांख्य दर्शन के 25 तत्त्वों में अलिंग, लिंग, लिंग शरीर , कारण और कार्य तत्त्व 

सांख्य दर्शन में सनातन , निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष और सनातन त्रिगुणी जड़ प्रकृति के संयोग से 23 तत्त्वों की निष्पति बताई गई है जिनसे 14 प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति होती है (देखें , निम्न स्लाइड को ) ।

प्रकृति - पुरुष संयोग से जो 23 तत्व उत्पन्न होते है वे त्रिगुणी एवं जड़ तत्व हैं लेकिन पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में चेतन जैसे दिखते हैं। प्रकृति और पुरुष को अलिंग कहते हैं । प्रकृति - पुरुष संयोग से उत्पन्न 23 तत्त्वों  (महत्तत्व, अहंकार, 11 इंद्रियां , 05 तन्मात्र और 05 महाभूत) को  लिंग कहलाते हैं और लिंग तत्त्वों में 05 महाभूतों को छोड़ शेष 18 तत्त्वों को लिंग शरीर कहते हैं।

लिंग तत्व वे तत्व है जिनका अपने - अपने कारण तत्त्वों में लीन हो जाते हैं। अलिंग तत्व वे हैं जिनका कोई कारण तत्व नहीं होता अतः उनका लय नहीं होता। लिंग शरीर अति सूक्ष्म शरीर है जो आवागमन करता हैं अर्थात जो बार - बार अपने में स्थित पुरुष को कैवल्य दिलवाने हेतु स्थूल शरीर धारण करता रहता  है। यहां ध्यान रखवा होगा कि बिना पांच महाभूतों के अर्थात बिना माता - पिता से प्राप्त स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर अस्थिर रहता है।

ऊपर व्यक्त सांख्य के 25 तत्त्वों में पुरुष न कारण है और न कार्य। जो तत्त्व किसी और तत्व को उत्पन्न करते हैं , उन्हें कारण कहते हैं और उत्पन्न होने वाले तत्त्व को कार्य कहते हैं। 11 इंद्रियां और 05 महाभूत केवल कार्य हैं। प्रकृति केवल कारण है। महत्त्व , अहंकार और 05 तन्मात्र , कारण और कार्य दोनों हैं। 

~~ ॐ ~~

Tuesday, March 31, 2026

पतंजलि योगसूत्र में योग क्या है ?



योग क्या है?

 मैं कौन हूं ? कहां से आया हूं ? और क्यों आया हूं ? जिसे इन तीन प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं , वह  विदेह हो जाता है और घड़ी भर जहां रुकता है , वह स्थान उस काल के लिए तीर्थ बन जाता है। ऐसा मनुष्य सिद्ध योगी होता है जिसे तत्त्ववित्  भी कहते हैं। 

ऊपर बताए गए तीन प्रश्न , सांख्ययोग और पतंजलि योग सूत्र दर्शन के आधार हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्र के आधार पर अब हम यहां योग को समझते हैं।

महर्षि पतंजलि कह रहे हैं …

“ योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:”

~ पतंजलि समाधिपाद सूत्र - 02~

ऐसी क्रियाएं जिनके अभ्यास से चित्त की वृत्तियों का निरोध हो , वे योग कहलाती है पर इतने से योग शब्द के रहस्य से पर्दा नहीं उठता। महर्षि पतंजलि के योग परिभाषा के संबंध में समाधिपाद सूत्र - 01 से पता चलता है कि योग क्या है ? जो निम्न प्रकार है …

“अथ योगानुशासनम् “

' अब योग अनुशासन प्रारंभ होता है ' 

यहां महर्षि योग को अनुशासन कह रहे हैं । अनुशासन दो शब्दों से मिल कर बना है - अनु + शासन। अनु का अर्थ है पहले से और शासन का अर्थ है जीवन जीने का यथार्थ मार्ग।

इस प्रकार समाधिपाद सूत्र :1 एवं सूत्र :2 को एक साथ देखने से जो सार निकलता है , वह निम्न प्रकार है …

 पतंजलि यहां स्पष्ट रूप से कह रहे हैं , यह योग कोई नया नहीं अपितु पहले से चला आ रहा योग है, मैं तो मात्र इसे स्पष्ट कर रहा हूं । अब यहां प्रश्न उठ सकता है कि आखिर जो योग पतंजलि अपनें योग सूत्र दर्शन के माध्यम से बता रहे हैं , उससे चित्त की वृत्तियों का निरोध तो हो जाता है पर इससे होता क्या है ? इस प्रश्न के समाधान के लिए महर्षि पतंजलि समाधिपाद में अगले सूत्र :1.3 और सूत्र:1.4 में कहते हैं ..

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 03 

तदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम् 

अर्थात 

योग माध्यम से  द्रष्टा ( पुरुष ) अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है 

पतंजलि समाधिपाद सूत्र : 04

वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र

वृत्ति स्वरुप जैसा अन्य स्थितियों में 

समाधिपाद सूत्र : 3 और सूत्र :4 का एक साथ भावार्थ देखते हैं ….

योग को छोड़ शेष  स्थितियों में पुरुष , चित्त स्वरूपाकार होता है जो योग सिद्धि मिलने पर अपने मूल स्वरूप में आ जाता है ।

अब ऊपर व्यक्त समाधिपाद सूत्र : 1 - 4 का सार एक साथ देखते हैं 

जो लोग योग में स्थित नहीं होते , उनके अंदर स्थित शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी चित्त स्वरूपाकार होता है। वहीं व्यक्ति जब योग में स्थित होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष यह नहीं समझता कि वह चित्त है अपितु वह अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है । निरंतर योगाभ्यास करते रहने वाले योगी का योग जब सिद्ध होता है तब उसके अंदर स्थित पुरुष चित्त के बंधन से अपनें को मुक्त देखते हुए अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है जिसे कैवल्य कहते हैं ।

पतंजलि योग दर्शन समाधिपाद के प्रारंभिक 04 सूत्रों को ठीक से समझने के लिए योगदर्शन के शेष 191 सूत्रों के साथ सांख्य योग के सार को भी समझना होगा। लेकिन आगे बढ़ने से पहले यह जानलेना आवश्यक है कि चित्त की वृत्तियां क्या हैं? चित्त त्रिगुणी है और तीनों गुणों की अपनी - अपनी वृत्तियों है। सांख्य और योगसूत्र में बुद्धि , अहंकार और मन के समूह को चित्त कहते हैं। पतंजलि योग दर्शन सूत्रों की साधना से तामस एवं राजस गुणों की वृत्तियों का निरोध पहले होता है इस प्रकार जब चित्त केवल सात्त्विक गुणों की वृत्तियों के प्रभाव में रहने लगता है तब निरंतर योगाभ्यास से इन वृत्तियों का भी निरोध हो जाता है और चित्त गुणों की वृत्तियों के मुक्त रहने लगता है जिसे कैवल्य कहते हैं । कैवल्य पाद सूत्र : 34 में कैवल्य की परिभाषा को देखें …

पुरुषार्थ शून्यानाम् गुणानाम् प्रतिप्रसव: कैवल्यम् ।

स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ।।

“ पुरुषार्थ का शून्य हो जाना और तीन गुणों की वृत्तियों का निरोध हो जाना , कैवल्य है ।

अब आगे की यात्रा पर निकलते हैं ….

 पतंजलियोग दर्शन में कुल 195 सूत्र हैं और ईश्वरकृष्ण रचित सांख्य दर्शन में 71 कारिकायें हैं जिनमें से आखिरी 3 को छोड़ शेष 68 कारिकाओ का संबंध तत्त्व ज्ञान से है जो प्रारंभ उठाए गए तीन प्रश्नों का हल देते हैं ।

सांख्य दर्शन और पतंजलियोग सूत्र दर्शन एक दूसरे के पूरक दर्शन हैं। सांख्य दर्शन सिद्धांत देता है , सिद्धांत की सिद्धि प्राप्ति के उपाय स्वरूप योग का पूरा विज्ञान , महर्षि पतंजलि देते हैं। अतः बिना सांख्य दर्शन समझे ,पतंजलियोग सूत्र दर्शन को नहीं समझा जा सकता और बिना पतंजलि योगदर्शन ,सांख्य के सिद्धांतों की सिद्धि प्राप्त करना भी संभव नहीं। 

सांख्य दर्शन , मैं कौन हूं की जिज्ञासा के समाधान का सिद्धांत देता है। सांख्य कहता है , त्रिगुणी , सनातन , स्वतंत्र , प्रसवधर्मी एवं जड़ तत्त्व प्रकृति एवं निर्गुणी , स्वतंत्र , सनातन एवं शुद्ध चेतन तत्त्व पुरुष के संयोग से सृष्टि है । पुरुष प्रकाश के प्रभाव में त्रिगुणी जड़ प्रकृति विकृत होकर बुद्धि , अहंकार , मन , 10 इंद्रियों, 5 तन्मात्र और 5 महाभूतों को उत्पन्न करती हैं। इन 23 तत्त्वों में प्रारंभिक तीन तत्त्वों ( बुद्धि , अहंकार , मन ) के समूह को चित्त कहते हैं, जैसा पहले भी बताया जा चुका है । प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व हैं क्योंकि इनका कारण मूल प्रकृति ( तीन गुणों की साम्यावस्था ) भी त्रिगुणी एवं जड़ हैं अतः कारण - कार्य सिद्धांत के आधार पर प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ होते हैं। प्रकृति - पुरुष संयोग होते ही शुद्ध चेतन पुरुष चित्त केंद्रित हो कर चित्त जैसा बन जाता है अर्थात शुद्ध चेतन पुरुष त्रिगुणी जड़ तत्त्व बन जाता है और प्रकृति पुरुष प्रकाश के प्रभाव में यह समझने लगती है कि उसे क्या करना है।

यहां एक गहरी शिक्षा मिलती है । जड़ की संगति में चेतन भी जड़ बन जाता है लेकिन चेतन की संगति में जड़ चेतन जैसा व्यवहार करने लगता है। जब आप किसी की संगति में हैं तो अपनी स्थिति को समझने की कोशिश अवश्य करें ।

 पुरुष ,प्रकृति के 23 तत्त्वों के माध्यम से भोग से मिलने वाले सुख और दुःख की अनुभूति करता है और प्रकृति के 23 तत्त्व उसे इस कार्य में मदद करते हैं। प्रकृति जानती है कि पुरुष को अपने मूलभस्वरूप में लौटना है और जब वह अपने मूल स्वरूप में लौटेगा तब मैं भी अपने मूल स्वरूप में आ जाऊंगी । भोग अनुभव से पुरुष को वैराग्य होता है। वह प्रकृति के प्रति उदासीन हो जाता है और अपनें मूल स्वरूप में आ जाता है। जब ऐसा होता है तब इसी के साथ-साथ प्रकृति के 23 तत्त्व अपनें - अपनें कारणों में लीन हो जाते हैं और अंततः बुद्धि प्रकृति में लीन हो जाती है और विकृति प्रकृति अपनें मूल स्वरूप (तीन गुणों की साम्यावस्था) में आ जाती है। पुरुष और प्रकृति दोनों अपने - अपनें मूल स्वरूप में निष्क्रिय होते हैं। 

पतंजलि योगसूत्र आधारित योगाभ्यास की सिद्धि से चित्त की वृत्तियां शांत हो जाती है । वैराग्य की ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है । पुरुष प्रकृति का बोध हो जाता है और यही बोध कैवल्य है जिसकी प्राप्ति से आवागमन से मुक्ति मिल जाती है जिसे मोक्ष कहते हैं।

~~ ॐ ~~