Saturday, November 7, 2026

गीता श्लोक 2.28


श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 2.28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।

अव्यक्तनिधनानि एव तत्र का परिदेवना।। गीता 2.28।।

यह श्लोक सम भाव योग सिद्ध योगी की ओर इशारा कर रहा है जो समभाव में स्थित होता है । अब श्लोक को समझते हैं।


 सभी भूत अव्यक्त थे ,अव्यक्त की ओर बढ़ रहे है, केवल वर्तमान में व्यक्त हैं अर्थात…

संसारके वर्तमान व्यक्त दृश्य वर्ग अव्यक्त से व्यक्त हुए हैं और सभी व्यक्त की आगे की यात्रा भी अव्यक्त हो है।

इस अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से पुनः अव्यक्त हो जाने की स्थिति में किसी के अव्यक्त हो जाने पर शोक क्या करना ! यह श्लोक भूतों के निम्न  जीवन चक्र जिसे आवागमन चक्र भी कहते हैं , की ओर ध्यान आकर्षित करता है …

।। जन्म ~>जीवन~> मृत्यु ~> जन्म ~> जीवन ~> मृत्यु ।।

इस आवागमन चक्र के मुक्ति उन्हें मिलती है जो स्थिरप्रज्ञ, गुणातीत और पुरुषार्थ शून्य सिद्ध योगी हैं। ऐसे योगी दुर्लभ होते हैं ।

प्रभु श्री कृष्ण का यह श्लोक , वैराग्य - बीज है जो कैवल्य का द्वार दिखाता है । ऐसी स्थिति प्राप्त करना कैसे संभव है? इसके लिए गीता में कुछ और तैरते हैं।

गीता अध्याय - 1 में 47 श्लोक हैं जिनमें 22 श्लोक अर्जुन के हैं और प्रभु श्री कृष्ण का कोई श्लोक नहीं है।अध्याय - 1 में अर्जुन वक्ता हैं और प्रभु श्री कृष्ण श्रोता । अध्याय - 1 मे अर्जुन के 22 श्लोकों में कही गई बातों को सुनने के बाद प्रभु श्री कृष्ण श्लोक - 2.2 में कहते हैं , अर्जुन ! यह असमय में तुझे मोह कैसे हो गया ? प्रभु का यह निष्कर्ष की तुम मोह के दलदल में डूब रहे हो, अर्जुन की बातों का सार है जिसे अर्जुन स्वयं नहीं समझ पा रहे। ऐसा हम - आप के साथ भी प्रतिदिन घटित होता रहता है। मनुष्य अपनी कही गई बात को तो समझता नहीं , दूसरों को समझाने में अपने को व्यस्त रखता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में कुल 700 श्लोक हैं जिनमें 574 श्लोक प्रभु श्री कृष्ण के हैं। युद्ध प्रारंभ होने से पहले अर्जुन को मोहमुक्त देखना चाहते हैं क्योंकि मोह ऊर्जा को क्षीण करती है और दुर्बल व्यक्ति युद्ध में भला जीत कैसे सकता है!

अध्याय - 2 में कुल 72 श्लोकों में 63 श्लोक प्रभु के हैं और इनमें से 13 श्लोकों का सीधा संबंध ज्ञानयोग के केंद्र आत्मा  से है । इसी अध्याय में 18 श्लोक स्थिर प्रज्ञ से भी संबंधित हैं। स्थिर प्रज्ञता से आत्मा का बोध होता है।


प्रभु श्री कृष्ण गीता में अपने 574 श्लोकों के माध्यम से अर्जुन की आसक्ति , कामना , काम , क्रोध , लोभ , मोह , भय , आलस्य , अहंकार आदि कर्म बंधनों  से मुक्त करा कर उसके प्रवृत्ति परक कर्म को निवृत्ति परक कर्म में बदल कर , वैराग्य में स्थित कर ज्ञान योग में प्रवेश कराना चाहते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 श्लोक 49 - 50 में प्रभु कहते हैं……

आसक्ति रहित कर्म से नैष्कर्म्य की सिद्धि मिलती है जो ज्ञानयोग की परानिष्ठा है ।

प्रभु श्री कृष्ण अपने 574  श्लोकों में जो कुछ भी कहें हैं , उनका सार ऊपर व्यक्त श्लोक 18.49 - 18.50 में व्यक्त किए हैं। प्रारंभ में दिए गए श्लोक - 2.28, समत्वयोग की पराकाष्ठा है जो  कैवल्यके द्वार है।

प्रभु श्री कृष्ण गीता में  उपासक अर्जुन को युद्ध उपासना के माध्यम से उपास्य से एकत्व स्थापित कराना चाहते हैं। 

गीता , महाभारत का अंग है। यदि आप महाभारत सार को अपने स्मृति में संचित कर रखे हों तो आप जानते होंगे कि पांडव महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर में राज्य किए जहां कर्म से कर्मयोग , कर्मयोग से वैराग्य और वैराग्य में ज्ञान अर्जित कर तपस्वियों का भेष धारण कर राज्य परीक्षित को दे कर आरण्य गमन किए थे। वर्षो आरण्य में वैरागी जीवन जीने के बाद स्वर्गारोहिणी यात्रा में स्वयं को परम सत्य में लीन कर दिए थे। 

अर्जुन, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं के मध्य प्रभु श्री कृष्ण के 574  श्लोक से जो ज्ञान - बीज प्राप्त किए , वह बीज अंकुरित हुआ हस्तिनापुर में और उसका फल स्वर्गारोहिणी यात्रा के रूप में दिखा।

तीर्थ , शास्त्र , सत्गुरु वैराग्य का बीज डालते हैं जो गृहस्थ जीवन में अंकुरित होते हैं , धीरे - धीरे वृक्ष बन जाता है। जब 40 वर्ष के ऊपर की उम्र होने लगती है तब वह तीर्थ सेवन , शास्त्र सेवन और सत्गुरु की उपासना का वृक्ष में वैराग्य नामक फल दिखने लगते हैं और  

तब ? 

वह वैरागी गृहस्थ प्रकृतिलय संन्यासी जैसा विदेह की भांति स्वेच्छा से अपना पञ्च भूतीय शरीर का त्याग कर देता है। इसे कैवल्य कहते हैं । ऐसा उपासक आवागमन से मुक्त हो जाता है।

~~।।हरे कृष्ण।।~~


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