Saturday, December 21, 2013

भागवत से कुछ सूत्र

भागवत साधना सूत्र - 03
1- भागवत : 1.3 > अज्ञान की बृत्तियाँ - अविद्या , मोह , राग ,द्वेष ,अभिनिवेश ।
2- भागवत : 1.7 > निर्मल मन माया और मायापति का द्रष्टा होता है ।
3-भागवत : 1.6> जिस बस्तुके खानें से जो रोग होता है उस बस्तु में उस रोग की दवा होती है ।
4-भागवत : 1.1 > इन्द्रिय - मन तंत्रकी पहुँच जहाँ तक है उसकी तह में जो होता है वह है प्रभु ।
5-भागवत : 11.19 > तप क्या है ? जिससे कामनाओं का उठाना समाप्त हो ,वह तप है ।
6-भागवत : 4.20 > शुद्ध चित्तकी स्थिति ही कैवल्य है ।
7-भागवत : 4.18 > बुद्धिमान ब्यक्ति भ्रमर जैसा होता है जो सर्वत्र से ज्ञान अर्जित कर लेता है ।
8-भागवत : 2.1> महत्तत्व क्या है ? आत्मा का नाम महत्तत्व है ।
9- भागवत : 2.7 > वैदिक या लौकिक किसी भी शब्द की पहुँच प्रभु तक नहीं ।
10-भागवत : 2.8 > जीवका कोई सम्बन्ध पञ्च भूतों से नहीं लेकिन जीवका शरीर पञ्च भूतों से निर्मित होता है ।
~~ ॐ ~~~

Tuesday, December 17, 2013

प्रभु रामका बंश

● हे राम ●
~ भागवत आधारित कथा ~
* द्रविण देशके योगी सत्यब्रत जो पिछले कल्पके अंत में हुयी नैमित्तिक प्रलयके एक मात्र द्रष्टा थे , इस कल्पमें विवस्वान् के पुत्र, सातवें मनु श्राद्धदेव हुए । श्राद्धदेवको वैवस्वान मनु भी कहते हैं ।
* श्राद्धदेव पुत्र प्राप्ति हेतु यमुना तट पर 100 वर्ष तक तप किया और 10 पुत्र प्राप्त हुए जिनमें बड़े थे इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकुके बड़े पुत्र थे विकुक्षि ।इक्ष्वाकु मनुके छीकनें से उनकी नासिका से पैदा हुए थे । विकुक्षिके बंश में आगे 15वें बंशज हुए युवनाश्व।युवनाश्वके दाहिनें कोख से मान्धाता ( 16वें बंशज - विकुक्षि के ) पैदा हुए । मान्धाताकी पुत्री विन्दुमतीके वंशमें ( 17वें बंशज ) आगे हुए पुरुकुत्स(18वें बंशज -विकुक्षिके ) । पुरुकुत्स नागोंकी बहन नर्वदासे ब्याह किया।
* इस बंशमें आगे त्रिशंकु हुए ,त्रिशंकु के पुत्र थे हरिश्चन्द्र । इस परिवार में आगे रघु हुए , रघुसे दशरथ और दशरथसे श्री राम । श्रीरामके पुत्र कुशके बंशमें कुश के आगे 26 वां बंशज हुआ तक्षक । तक्षक परीक्षित को डसा और परीक्षितका अंत हुआ । ** आप देख रहे हैं कि मान्धाता पुत्री विन्दुमती के पुत्र पुरुकुत्सबंशमें श्री राम पैदा हुए और पुरुकुत्स का ब्याह नागों की बहन से हुआ अर्थात श्री रामके अन्दर सर्प बंशका भी DNA था और श्री राम के बाद उनका 27वां बंशज तक्षक हुआ जो जब चाहे सर्प बन जाए और जब चाहे मनुष्य ।
** यह वही तक्षक है जो ज्ञान -विज्ञान की संसारका पहला विश्वविद्यालय स्थापित किया उस स्थान पर जो संसारके ब्यापारिक मार्गोंका संगम था और जिका नाम रखा गया तक्षिला जो आज पाकिस्तान में इस्लामाबाद के पास है ।तक्षिलासे पाणिनि , चरक और कौटिल्य जैसे ज्ञानी - विचारक पैदा हुए ।
~~ ॐ ~~

Monday, December 9, 2013

कुरुक्षेत्र कहाँ है ?

● कुरुक्षेत्र क्या है ? 
● क्या यह एक बस्ती है ? 
● क्या यह एक क्षेत्र है ?
● यह कहाँ है ?
गीताका कुरुक्षेत्र कोई स्थान का नाम न था यह एक क्षेत्रका नाम था जिससे हो कर सरस्वती नदी नदी एवं इक्षुमती नदियाँ बहती थी और दोनों अरब सागरमें पहुँचती थी ।
 * भागवत स्कन्ध - 5 में भूगोल दिया गया है जो यह बताता है कि , जम्बू द्वीपका मध्य भाग इलाबृत्त वर्ष है । इलाबृत्तके दक्षिण में क्रमशः हरि वर्ष , किम्पुरुष वर्ष और भारत वर्ष देश हैं । भारत वर्ष हिमालय पर्वतके दक्षिणमें स्थित वर्ष है अर्थात हिमालय के ऊपर और इलाबृतके मध्य दी देश हैं -हरि और किम्पुरुष ।हनुमानजी किम्पुरुष थे ,इस श्रेणी में ऐसे बानर आते हैं जो मनुष्य जैसा दिखते हों । 
* भागवत : 1.10 > कृष्ण जब महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर से द्वारका निम्न नार्ग से गए थे । हस्तिनापुर - कुरुजांगल - पांचाल - शूरसेन - ब्रह्मावर्त - कुरुक्षेत्र - मत्स्य - सारस्वत - मरुधन्व - सौभिर - आभीर - आनर्त - द्वारका । <> अब जरा सोचिये कि कुरुक्षेत्र की स्थिति क्या है ? अब कुछ और सूचनाएं :---- 
* जम्बू द्वीपके मध्य देश इलाबृत्तके उत्तरमें क्रमशः रम्यक , हिरण्य और कुरु देश ( वर्ष ) हैं । कुरु देशके बाद उत्तर में कोई देश नहीं है सागर है। इलाबृत्तके मध्य में मेरु पर्वत है जहाँ गंगा उतरते ही चार धाराओं में विभक्त हो जाती हैं । गंगा की वह धारा जो कुरु देशको पार करती हुयी सागरसे जा मिलती है उसे भद्रा कहते हैं और भारत वर्ष से बहनें वाली धारा को अलखनंदा कहते हैं । 
* महाभारतके समय मूल कुरु , भूगोल की दृष्टि से चीन , मंगोलिया और रूस का भाग था ।भारत वर्ष में दक्षिण कुरुके अंतर्गत हिमालयके दक्षिणी भाग जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जमुनाके पश्चिम में हरियाणाका भू भाग , दक्षिणी हरियाणा तथा राजस्थानका कुछ पूर्वी भाग आते हैं ।दक्षिण हरियाणा से होती हुयी राजस्थान के कुछ भागों से हो कर सरस्वती , नर्वदा और यमुनाके मध्य से गुजरती हुयी मध्य प्रदेशके अम्बिका पुर तक जाती थी और फिर अम्बिका बन से पश्चिम मुखी हो कर नर्वदा के समानांतर बहती हुयी नारायण सरोवर के पश्चिम में प्रभास क्षेत्रके भी पश्चिम में सागर से मिलती थी ।कुरुक्षेत्र से सरस्वती और इक्षुमती ये दो प्रमुख नदियाँ अहमदाबाद ( गुजरात ) की ओर से होती हुयी आगेअरब सागर से मिलती थी । सरस्वती नरायण सरोवरसे सागर में गिरती थी और इक्षुमती सिंध देश में पहुँच कर सागर में गिरती थी । नरायण सरोवर सरस्वती और सागर के संगम का नाम है <> अब कुछ और बातें :---
 * महाभारत में 18 खंड हैं । * गीतामें 18 अध्याय हैं ।
 * महाभारत युद्ध 18 दिन चला था । * युद्धमें 18 अक्षवनी सेनायें भाग ली थी । * युद्धमें 21870 लोग प्रति दिन मारे गए । * महाभारत में 6वां खंड भीष्मखंड है । 
* भीष्मखंडके 4 उप खंड इस प्रकार से हैं ---
 1- जम्मू खंड निर्वाण पर्व ( 6.1-6.19 ) 
 2- भूमि पर्व ( 6.11 - 6.6.24 ) 
 3- गीता ( 6.25 - 6.42 )
 4- भीष्म पर्व ( 6.43 - 6.122 ) 
* महाभारत युद्ध में पांडव पक्ष में कौन लोग थे ?
 > द्वारका , काशी , एक भाग कैकेयका , मगध , छेदी , पंड्या , मथुराका यदूकुल , ये सभीं पांडव पक्ष में थे और :---
 * कौरव पक्ष में निम्न लोग थे :---
 > प्रागजोतिश , मत्स्य , अंग , कैकेयका एक भाग , सिन्धु देश , माहिष्मती ( इंदौर ) , उज्जैन , गंधार , बालिका , काम्बोजा , यवन , सक , तुसार
 ** कुरुक्षेत्र के सम्बन्ध में निम्न बात को भी देखना चाहिए :--- > उत्तर में सिरहंद ( पंजाब ) बताया गया है ।
 > दक्षिण में खंडवा ( दिल्ली ) का जंगली क्षेत्र बताया गया है । > पूर्व में panin
 > पश्चिम में मरू
 कुरुक्षेत्र की यह स्थिति Buddhist scripture Anguttara Nikaya में दिया गया है । 
● भागवत 12.1-12.2 में दिए गए वर्णन से महाभारत से 2013 तक 3450 वर्ष बनाता है और उस समय भारत भूमि 16 महाजन पदों में बिभक्त था , कुछ इस प्रकार :------ 
अंग  , मगध,  विजी, काशी , मल्ल , कोशल ,पंचाल , वट , चेतिया , अवंती , असाका , मत्या,  सुरसेना ,  कुरु , गंधार , कम्बोज । 
● कुरु जनपद ● 
> गंगा और यमुना के मध्य का भाग …
 > यमुना और सरस्वती के मध्य का भाग…
 > हस्तिनापुर थानेश्वर और हिसारके मध्यका त्रिभुजाकार क्षेत्र कुरुजनपद था ; हस्तिनापुर और यमुनाके मध्यका भाग था कुरुराष्ट्र और शेष भाग दो भागो में था ------ 
1- दिल्ली के आस पासका भाग । 2- कुरु जंगल । 
1- दिल्ली क्षेत्र में निम्न आते थे :--- 
दिल्ली , मेवात , रोहतक तथा आस पासका क्षेत्र
 2- कुरु जंगलकी स्थिति निम्न प्रकारसे थी :--
 > पानीपत से अम्बाला तक तथा अम्बाला से हिसार , हांसी जींद और रोहतक तक का क्षेत्र कुरु जंगल था और यमुना के पूर्व में भी यह जंगल फैला हुआ था । 
°° कुरुक्षेत्र को वेदोंमें स्वर्ग में रह रहे लोगों के तीर्थ रूप में बताया गया है । उत्तरा बेदी और समंत पंचक तीर्थ का भी नाम इससे जुड़ा है । यहाँ शक्ति पीठ भी है । कुरुक्षेत्र से इक्षुमती और सरस्वती नदी बहती थी । परशुराम यहाँ पांच बड़े - बड़े तालाब बनाए थे जिससे महिष्मति में सहस्त्र बाहु अर्जुन के साथ हुए युद्ध में बहने वाला खून इकठ्ठा हो सके । 
** ॐ **

Thursday, December 5, 2013

भागवत साधना सूत्र - 2

1- भागवत : 1.2 > शब्दसे दृश्य एवं द्रष्टा का बोध होता है और शब्द आकाशका गुण है।
2- भागवत : 1.3 > सृष्टि पूर्व न दृश्य था न द्रष्टा
था , जो था , वही परमात्मा है ।
3- भागवत : 3.5> द्रष्टा और द्रश्यका अनुसंधान करनें की उर्जा ही माया है ।
4- भागवत : 1.3> संसारमें दो प्रकारके लोग खुश
हैं ; एक वे जो मूढ़ हैं और दुसरे वे जो स्थिर
प्रज्ञ हैं ।
5- भागवत : 1.3 > अनात्मा बस्तुयें हैं नहीं , हैं जैसा प्रतीत होती हैं ।
6- भागवत : 1.3 > विषयोंका रूपांतरण ही काल का आकार है ।
7- भागवत : 2.1> काल प्रभुकी चाल है ।
8- भागवत :3.21.41> ब्रह्म काल चक्रकी धूरी हैं । 9- भागवत : 7.7 > बुद्धि की बृत्तियाँ - जाग्रत , स्वप्न और सुषुप्तिकी अनुभूति करनें का श्रोत , भगवान है ।
10- गीता - 10.30 > कालः कलयतां अहम् । 11- भागवत : 5.1> इन्द्रियोंका गुलाम जन्म - मृत्युके भयमें बसता है ।
~~ ॐ ~~

Wednesday, December 4, 2013

भागवत -गीता के साधना सूत्र - 1

1~ सात्विक गुण प्रभुका दर्शन कराता है ।
2~ सृष्टि प्रभुके नारायण रूप से जो 16 कलाओंसे युक्त है ( कलाएं - 10 इन्द्रियाँ + 5 महाभूत + मन ) उससे है ।
3~ प्रभु सभींके अन्दर - बाहर एक रस है ( गीता - 13.15 ) ।
4~ प्रभुका कोई प्रिय - अप्रिय नहीं (गीता - 5.14-5.15 + 9.29 ) ।
5~ धर्म के चार चरण ----- *तप+सत्य+दया+पवित्रता *
6~ होशका एक घडीका जीवन बेहोशीके सौ सालके जीवनसे अधिक आनंददायी होता है
7~ वैराज्ञमें गुण तत्त्वोंकी पकड़ नहीं होती (गीता - 2.52 )।
8- दुःख संयोग वियोगः योगः (गीता - 6.23 )। 9~ योगमें आसन , श्वास , आसक्ति , इन्द्रियों की गति , मनकी चाल पर नियंत्रण रखनेंका अभ्यास किया जाता है ।
10~ मायातीत एक से अनेक होनें में काल, कर्म और स्वभावको स्वीकारा है ।
~~~ ॐ ~~~

Friday, November 29, 2013

कलियुगकी तस्बीर

● भागवत स्कन्ध 12.1● 
सन्दर्भ : अध्याय 1 से 3 तकका सार कुछ इस प्रकार है :--- * परीक्षितसे सन 2013 तकका समयकी गणना भागवत में इस प्रकारसे है :--- 1115+137+185+2013>3450 वर्ष अर्थात महाभारत युद्ध हुए 3450 वर्ष हुए । 
<> भागवत कलि युग की एक तस्बीर प्रस्तुत करते हुए कह रहा है : 
 ● जैसे -जैसे कलियुग गहराता जाएगा वैसे - वैसे सौराष्ट्र , अवंती , आभीर , शूर , अर्बुद और मालव देशके ब्राह्मण संस्कार शून्य हो जायेंगे और वहाँके राजा शुद्र तुल्य होंगे ।
 ● जिसके हाँथ में शक्ति होगी वही धर्म और न्यायकी ब्यवस्था करेगा । 
● ब्राह्मण साधनासे नहीं यज्ञोपवीत और जातिसे पहचानें 
जायेंगे ।
 ● सत्यकी राह पर चलनें वाला अदालतसे न्याय नहीं प्राप्त कर सकेगा। 
● जो ज्यादा बोलेगा उसे महान पंडित समझ जाएगा । 
● गरीबी एक मात्र पहचान होगी असाधुता और दोषी होनें की ।
 ● अधिक वारिश ,सखा , अधिक गर्मी ,अधिक शर्दी , बाढ़का प्रभाव रहा करेगा । 
● छोटे कद के अन्नके पौधे होंगे ।
 ● बिजली अधिक चमकेगी पर वर्षात कम होगी। 
● मनुष्य बिषयी होंगे । 
● स्त्रियोंका कद छोटा होगा । 
● परीक्षित-जन्मके समयका ज्योतिष :- 
^ जब सप्त ऋषि उदय होता है तब पहले दो तारे दिखते हैं । उनके बीच यदि दक्षिण-उतर दिशामें एक रेखा खीची जाए तो अश्वनी आदि नक्षत्रोंमें से एक उस रेखाके मध्यमें दिखता है । उस नक्षत्रके साथ सप्त ऋषि सौ वर्ष रहते हैं । 
 ● परीक्षितके जन्मके समय और मृत्युके समय मघा नक्षत्र था । * पृथ्वीको जीतनेंकी अभिलाषावाले राजाओं पर पृथ्वी हसती है और कहती है :--
 <> ये स्वयं मौतके खिलौनें हैं और मुझे जीतना चाहते हैं , ये बेहोशीमें भाग रहे हैं । 
* कलियुगमें पाखंडी लोग छा जायेंगे और नया -नया पंथ चलाएंगे तथा वेद बचनको तर्कके आधार पर अपनी सोचके अनुरूप प्रकट करेंगे और लोग उनसे प्रभावित भी होंगे। 
~~ ॐ~~~

Wednesday, November 27, 2013

कृष्ण - धन्वन्तरि

● कृष्ण और धन्वन्तरि ● 
सन्दर्भ : भागवत 9.1+9.15 
* सांख्य योगके जनक प्रभु श्री कृष्ण और आयुर्वेदके जनक धन्वन्तरि का बंश एक है । कृष्ण 20वें अवतारके रूपमें देखे जाते हैं और धन्वन्तरिको 12वें अवतार रूप में देखा जाता है ।अब आगे की कथाको देखते हैं ----
 * धन्वन्तरि 
 > ब्रह्मा पुत्र मरीचि ,मरीचि पुत्र कश्यप ऋषि , कश्यप के पुत्र थे , विवस्वान् विवस्वान् के पुत्र हुए सातवें मनु श्राद्धदेव । एक कल्प में चौदह मनु होते हैं और श्राद्ध देव इस कल्पके सातवें मनु हैं । 
* श्राद्ध देवको कोई संतान न होनेंसे वे चिंतित रहते थे । वसिष्ठ ऋषि मित्रावरुणका यज्ञ कराया , पुत्र प्राप्ति हेतु लेकिन पुत्री प्राप्त हुयी जिसका नाम था इला । 
 * इलाको वसिष्ठ पुत्र में बदल दिया जिसका नाम था सुद्युम्न लेकिन श्राद्ध देव मनुके सामनें गहरी समस्या आ खड़ी हुयी , शिव श्राप से सुद्युम्न एक माह स्त्री रहनें लगे और एक माह पुरुष ।
 * जब ये स्त्री रूप में होते तब इनको इला नाम से जाना जाता था और पुरुष रूप में सुद्युम्न नाम से । 
 <> ब्रह्माके दुसरे पुत्र अत्रिके पुत्र चन्द्रमा बृहस्पतिकी पत्नी को चुरा लिया और उनसे बुध का जन्म हुआ । 
 * बुध और इलासे जो पुत्र पैदा हुआ उसे पुरुरवा नाम मिला । पुरुरवाका उर्बधिसे मिलन हुआ , कुरुक्षेत्रमें सरस्वतीके तट पर और दोनोंसे 06 पुत्र पैदा हुए । 
*पुरुरवाके बड़े पुत्र आयु के 05 पुत्रों में दूसरे पुत्र क्षत्रबृद्ध के बंश में 08वें बंशज हुए धनवन्तरि ।।
 * आयुके बड़े पुत्र नहुषके बंशमें द्वापरके अंतमें शूरसेनके पौत्र रूपमें पैदा हुए प्रभु श्री कृष्ण । धन्वन्तरि और कृष्ण पुरुरवा और उर्बशी से प्रारम्भ हुए चन्द्र बंश में पैदा हुए थे । धन्वन्तरि आयुर्वेदके रूप में मनुष्य को परम ज्ञान दिया और कृष्ण 
सांख्य - योगका प्रयोग महाभारत युद्ध में करके यह दिखाया कि कर्म योग से भी वही मिलता है जो ज्ञान योग योग से मिलता है और कर्म योग आगे चल कर ज्ञान योग में रूपांतरित हो जाता है । 
~~ ॐ ~~