मुक्तिका उपनिषद्
मुक्तिका उपनिषद् मध्यकालीन संभवतः 10वीं से 17वीं शताब्दी के बीच की मानी जाती है और कुछ विद्वान इसे दाराशिकोह के फारसी अनुवाद से पहले का मानते हैं।
दारा शिकोह 1615 में पैदा हुआ और मुग़ल साम्राज्य के प्रसिद्ध शहंशाह शाहजहाँ और मुमताज़ महल का सबसे बड़ा पुत्र था । यह अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था। दारा शिकोह को एक विद्वान, दार्शनिक और सूफ़ी विचारधारा में गहरी रुचि रखने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। उसने इस्लाम और हिंदू धर्म के बीच साम्य स्थापित करने का प्रयास किया, जिसके लिए उसने संस्कृत ग्रंथों जैसे उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया। उसकी प्रसिद्ध रचना सिर्र-ए-अकबर (रहस्यमय रहस्य) और मजमा-उल-बहरैन (दो समुद्रों का मिलन) इस्लामी सूफ़ीवाद और हिंदू वेदांत दर्शन के बीच तालमेल को दर्शाती है। सत्ता के संघर्ष में उसका छोटा भाई औरंगज़ेब उससे आगे निकल गया। 1658 में समुगढ़ का युद्ध हारने के बाद, दारा शिकोह को गद्दी से वंचित कर दिया गया और 1659 में औरंगज़ेब के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई थी। दारा शिकोह को सन 1640 में कश्मीर की यात्रा के दौरान उन्हें पहली बार उपनिषदों के बारे में पता चला। इन ग्रंथों की दार्शनिक गहराई उन्हें अचंभित कर दिया।
दारा सन1654 में बनारस के संस्कृत पंडितों को दिल्ली बुलाकर उपनिषदों का फारसी मेंअनुवाद कराने का कार्य शुरू किया और 1657 में 50 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में तैयार अनुवाद को सिर्र-ए-अकबर (The Great Secret) नामक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित करवाया। यह अनुवाद यूरोप पहुँचा, लैटिन में इसका अनुवाद हुआ जो आर्थर शॉपेनहावर जैसे अनेक दार्शनिकों को
प्रभावित किया । आर्थर शॉपेनहावर जैसे दार्शनिकण उपनिषदों को "जीवन की सांत्वना" बताया।
मुक्तिका उपनिषद् एक महत्वपूर्ण उपनिषद है, जो 108 उपनिषदों की आधिकारिक और सर्वमान्य सूची प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध है। यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित मानी जाती है और यह सामान्य उपनिषदों की श्रेणी में आती है।
मुख्य विशेषताएँ
यह एक संवाद रूप में है, जिसमें भगवान श्रीराम अपने परम भक्त हनुमान जी को मोक्ष (मुक्ति) का मार्ग और उपनिषदों का ज्ञान देते हैं। इसलिए इसका नाम मुक्तिका (मोती या मुक्ति का प्रतीक) पड़ा है। इसमें कुल लगभग 125 श्लोक (या मंत्र) हैं, जो निम्न प्रकार दो अध्यायों में विभाजित हैं….
प्रथम अध्याय (करीब 49 श्लोक )
मुक्ति के विभिन्न प्रकारों (जैसे क्रम मुक्ति, सद्य मुक्ति, जीवन्मुक्ति, विदेह मुक्ति) का वर्णन, और कैवल्य मुक्ति (पूर्ण अद्वैत ज्ञान से मुक्ति) को सर्वोच्च बताना।
द्वितीय अध्याय (करीब 76 श्लोक)
108 उपनिषदों की विस्तृत सूची, उनके वेदों से संबंध और वर्गीकरण (मुख्य, सामान्य, योग, संन्यास, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि)।
मुक्तिका उपनिषद् का मुख्य सार
मुक्ति का एकमात्र सच्चा प्रकार: कैवल्य (पूर्ण अद्वैत ज्ञान से आत्मा का ब्रह्म में लीन होना)।
राम जी कहते हैं कि इन 108 उपनिषदों का अध्ययन (श्रवण, मनन, निदिध्यासन) करने से पाप नष्ट होते हैं, और एक बार सुनने मात्र से भी मुक्ति का मार्ग खुलता है।
मांडूक्य उपनिषद् का विशेष महत्व: राम जी कहते हैं कि यदि केवल मांडूक्य उपनिषद् (और उसकी गौडपाद कारिका) का पूर्ण ज्ञान हो जाए, तो भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है।
ये 108 उपनिषद् सभी वेदों के सार हैं और इन्हें गुरु से पढ़कर जीते जी मुक्ति और अंत में विदेह मुक्ति प्राप्त होती है।
मुक्तिका उपनिषद् उपनिषदों का "कैनन" या निर्देशक ग्रंथ है। यह बताता है कि मुक्ति के लिए ज्ञान मार्ग (वेदांत) सर्वोत्तम है, और इन 108 उपनिषदों का अध्ययन मोक्ष का सीधा साधन है।
मुक्तिका उपनिषद् ही वह एकमात्र ग्रंथ है जो 108 उपनिषदों की पूरी सूची देता है, जो सर्वमान्य है। ये चार वेदों में निम्न प्रकार विभाजित हैं…
ऋग्वेद > 10 उपनिषद् , शुक्ल यजुर्वेद >19 उपनिषद्
कृष्ण यजुर्वेद > 32 उपनिषद् , सामवेद > 16 उपनिषद्
अथर्ववेद > 31 उपनिषद् ।
इन 108 उपनिषदों में प्रमुख 10 उपनिषद् निम्न हैं …
ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक । इनका भाष्य आदि शंकराचार्य जी द्वारा लिखा गया है और इन्हें देशोपनिषद् कहते हैं। इनके बारे में अगले अंक में चर्चा होगी ।
।।।। ॐ।।।।
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