Monday, October 21, 2013

एक तरफ सुख और दूसरी तरफ दुःख

● सुख और दुःख ●
* सन्दर्भ : भागवत स्कन्ध - 10 *
** आप सभीं लोग जरा इस प्रसंग पर सोचना ।
* कृष्ण और बलराम ब्रजमें 11 साल रहे और कंशको जब नारद द्वारा यह पता चला कि सभीं ब्रजबासी विष्णु भक्त देवता हैं और नन्दके पुत्र रूप में रह रहे , कृष्ण - बलराम बसुदेवके पुत्र हैं , कृष्ण विष्णुका अवतार है और बलराम शेषजीका अवतार
हैं । यह सारा तंत्र देवताओं और विष्णुका फैलाया हुआ है , आपको मारनें के लिए । आपके अंत की सभीं तैयारियां हो चुकी हैं केवल वक़्त का इन्जार किया जा रहा है , अब ऐसी परिस्थितिमें अपनें बचनेंका उपाय आप सोच सकते हैं तो सोचें , देर करना उचित नहीं ।
* कंश बसुदेव कुलके सदस्य अक्रूरके माध्यम से कृष्ण , बलराम , नन्द और सभीं ब्रज बासियोंको मथुरा आनेंका आमंत्रण भेजते हैं , मथुरामें धनुष यज्ञका महा उत्सव आयोजित किया जा रहा है ।कृष्ण सहित सभीं ब्रज बासी मथुरा आते हैं और मथुराके बाहर डेरा डालते हैं ।
* कंश बधके साथ दो घटनाएँ एक साथ घटित होती हैं ; कृष्ण जो अभीं तक यशोदा की उंगली पकड़ कर कन्हैयाके रूपमें ब्रजकी गलियोंमें सबके जीवन रेखाके रूपमें घूमते रहते थे , वही कन्हैया माँके सामनें आ कर कह रहे हैं कि अब आप लोग ब्रजको वापिस लौट जाय , मैं आप सबसे मिलनें आऊंगा , आप को दुःख तो होगा लेकिन वक़्त की चाह यही है और दूसरी घटना यह है की दोनों भाई मथुरा से लगभग 600 km दूर उज्जैन सान्दिपनी मुनिके आश्रम शिक्षा प्राप्तिके लिए जाते हैं ।
**अब दो बातें जो ध्यान - माध्यम हैं **
1- उज्जैन में सांदीपनी मुनिके यहाँ 64 दिनों में 64 विद्याओंको ग्रहण करना ।
2- कृष्णके बिना यशोदाका मथुरासे ब्रज की यात्रा जो लगभग 30 km है किस तरह से कटी होगी ?
* कृष्ण शिक्षा प्राप्तिके बाद माँ यशोदा से स्वयं मिलनें न जा कर अपने मित्र उद्धव को भेजते हैं।
* कृष्ण 11 सालके थे जब मथुरा आये और फिर लौटके यशोदा - नन्द से मिलनें कभीं नहीं गए ।
* माँ यशोदा और नंद को जब पता चला कि कुरुक्षेत्र में सर्बग्रास सूर्य ग्रहणके अवसर पर उनका कान्हा वहाँ आ रहे हैं तब सम्पूर्ण ब्रज , माँ यशोदा एवं नन्द कुरुक्षेत्र आये और सभीं तीन माह कान्हाके साथ रहे लेकिन उस समय उनका कान्हा लगभग 75-80 साल का हो चूका था ,यह घटना महाभारत युद्धसे पहले की है ।
** भक्ति मार्गी यशोदा के ह्रदय पर ध्यान करें ।
* और *
** ज्ञान योगी कृष्णके ऊपर ध्यान करें ।
~~~ ॐ ~~~

Friday, October 18, 2013

भागवत स्कन्ध - 3 भाग - 1

● भागवत स्कन्ध 3 भाग - 1 ( सार ) 
 <> स्कन्ध - 3 में 1410 श्लोक 33 अध्यायों में हैं ।
 <> यह स्कन्ध ऋषि मैत्रेय और विदुरका संबाद है । 
# विदुर महाभारत युद्धसे ठीक पूर्व धृतराष्ट्र को जो सलाह दिए उसे विदुर नीतिके नामसे जाना जाता है । महाभारत युद्धसे ठीक पहले कृष्ण हस्तिनापुर आये , समझौता करानें लेकिन विफल
 हुए , इसी सन्दर्भमें विदुर को अपमानित किया गया और विदुर हस्तिनापुर छोड़ कर तीर्थ यात्रा पर निकल गए ।
 # विदुर इस यात्रामें सरस्वती के तटके 11 तीर्थो का सेवन किया जो निम्न प्रकार से हैं । त्रित , उशना ,मनु , पृथु , अग्नि , असित , वायु , सुदास , गौ , गुह और श्राद्धदेव । # विदुर जब यात्रासे वापिस हुए तब पहले बृंदाबनमें कृष्णके बाल सखा उद्धवसे मिले और फिर कुशावर्त गंगा तट पर ( हरिद्वारके समीप ) मैत्रेयजीके आश्रम पर उनसे ज्ञान प्राप्त किया ।उद्धव देखनेंमें एकदम कृष्ण जैसे थे और 05 साल की उम्रमें कृष्णकी प्रतिमाएं बनाया करते थे । उद्धवजी असुरोंको भी प्रभु भक्तके रूपमें देखते हैं , उद्धव कहते हैं , असुर लोग द्वेष भावसे ही सही लेकिन हर पल प्रभुको अपनी बुद्धिमें बैठाए तो रहते ही हैं । 
# उद्धव प्रभु की बाल लीलाओं का वर्णन विदुर को सुनाया ।
 # विदुर उद्धवसे मिल कर कुशावर्त क्षेत्र हरिद्वार पहुंचे जहां मैत्रेय का आश्रम था । जब द्वारका एवं यदुकुलका अंत हुआ और प्रभु स्वधाम गए तब मैत्रेय प्रभास क्षेत्रमें सरस्वती तट पर पीपल पेड़के नीचे प्रभुके साथ बैठे थे । 
# मैत्रेयका सृष्टि विज्ञान : स्कन्ध 2.5में ब्रह्माके सृष्टि विज्ञान और यहाँ स्कन्ध -3.5 में मैत्रेय के सृष्टि विज्ञानमें कोई विशेष अंतर नहीं है :
 * तामस अहंकार और कालसे ब्रह्माके विज्ञानमें भूतों की उत्पत्ति होती है और भूतोंसे तन्मात्रों की और यहाँ मैत्रेय तन्मात्र से भूतों की रचना बता रहे हैं ।
 मैत्रेय कहते हैं --- 
# तामस अहंकार और कालसे महत्तत्त्व बना
 * महत्तत्व और कालसे शब्द उपजा हो दृश्य -द्रष्टाका बोध कराता है । + शब्दसे आकाश है । 
* आकाश और कालसे स्पर्श उपज + स्पर्शसे वायु है ।
 * वायु और कालसे रूप उपजा । 
* रूपसे तेज है ।
 * तेज और कालसे रस उपजा । 
* रससे जल है ।
 * जल और कालसे गंध उपजा । 
* गंध से पृथ्वी है ।
 ** 23 तत्त्व ( 11 इन्द्रियाँ + 5 भूत +5 तन्मात्र +अहंकार + महत्तत्त्व ) प्रभुकृपा से आपसमें मिले और अधिपुरुष की उत्पत्ति हुयी ।अधिपुरुषसे सृष्टि आगे बढ़ी ।
 ** स्कन्ध - 3 का यह पहला भाग है ।
** भाग - 2 अगले अंकमें आप देख सकते हैं । 
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, October 15, 2013

परशुराम और विश्वामित्र

● परशुराम-विश्वामित्र ●
हिन्दू शास्त्रों में विश्वामित्र और परशुरामका महत्वपूर्ण स्थान है और दोनों की मूल भी एक है ।
* ब्रह्मासे अत्रि ऋषि हुए ,अत्रिसे चन्द्रमा और चन्द्रमा वृहस्पतिकी पत्नी तारासे बुध पैदा हुए।
* बुधसे पुरुरवा पैदा हुए । पुरुरवा और उर्बशी का मिलन कुरुक्षेत्र में सरस्वती तट पर हुआ और दोनों ब्याह बंधन में जुड़ गए । पुरुरवा से 06 पुत्र हुए ।
* पुरुरवाके पुत्रोंमें एक थे विजय जिनका पुत्र था
जुह्नु । जुह्नु बंशमें आगे 5वें बंशज हुए कुशाम्बु । कुशाम्बूके पौत्र हुए विश्वामित्र और कुशाम्बू की पौत्री से जम्दाग्नि पैदा हुए जिनके पुत्र थे परशुराम।
* कुशाम्बुके पुत्र गाधि और गाधिके पुत्र विश्वामित्र
थे ।गाधिकी पुत्री सत्यवतीके पुत्र थे जमदाग्नि और जमदाग्निके पुत्र थे परशुराम ।
* सत्यवती बाद में कौशकी नदी बन गयी थी । कौशकी नदी सरयू और गंगाके मध्य हुआ करती
थी ।कौशकी नदीके तट पर श्रृंगी ऋषि परीक्षितको श्राप दिया था ।
~~~ ॐ ~~~

Saturday, October 12, 2013

भरत जिनके नाम से भारतवर्ष है

● रिषभ देव पुत्र भरत -1 ● 
<> सन्दर्भ : भागवत : स्कन्ध -1 , 5 , 11
 ** बंशावली ** 
स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियब्रत ,प्रियब्रतसे आग्निध्र ,आग्निध्रसे नाभि और नाभिसे ऋषभ देव पैदा हुए। रिषभदेव 08वें विष्णुके अवतार थे और इनके पुत्र हुए भरत ।रिषभ देव जैनधर्म में पहले तीर्थंकर माने जाते हैं । ऋगवेदमें रिषभदेव का सन्दर्भ मिलता है और सिन्धु घाटी की सभ्यताके सन्दर्भ में की गयी खुदाइयों में इनके प्रमाण मिले हैं । 
 °° भरत °° 
 * स्वयाम्भुव मनु ब्रह्मावर्तके सम्राट थे ,ब्रह्मावर्तकी राजधानी
 थी , बहिर्षमती। यमुनातटके इस क्षेत्रमें सरस्वती नदी पूर्वमुखी थी और दुसरे वाराह अवतारमें प्रभु पृथ्वीको रसातलसे ऊपर इसी क्षेत्रमें ले कर आये थे ।
 * स्वायम्भुव मनुकी कन्या देवहूतिका ब्याह कर्मद ऋषि (विन्दुसरआश्रम ) से हुआ था और 05वें अवतारके रूपमें कर्मदके पुत्र रूपमें कपिल का जन्म हुआ । कपिलके सम्बन्धमें प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं ( गीता 10.26 ) सिद्धानां कपिलः मुनिः अस्मि । कपिल मुनि सांख्य योगके जनक कहे जाते हैं ।कर्मद ऋषि ब्रह्मा की छाया से पैदा हुए थे ।
 * रिषभदेवका ब्याह इंद्रकी पुत्री जयंतीसे हुआ और इनके 100 पुत्रोंमें भरत बड़े पुत्र थे । रिषभदेव भरतको राज्य देकर स्वयं अवधूत जीवन गुजारा , ब्रह्मावर्तको त्याग कर कुटकाचल (कर्नाटक ) के जंगलमें अजगर बृति अपना ली और दिगंबरके रूपमें जंगलकी दावाग्निमें अपना शरीर त्यागा लेकिन जैन शास्त्र कहतेहैं कि इनके महा निर्वाणका क्षेत्र कैलाश है । 
* भरतका ब्याह पंचजनीसे हुआ और पांच पुत्र पैदा हुए ।भरत एक करोड़ साल राज्य किया। अजनाभवर्ष इनके नामसे भारतवर्ष हो गया। भरत राज्य पुत्रोंमें बाट कर स्वयं हरिहर क्षेत्र पुलहाश्रम,गण्डकी नदी ,शालग्राममें पहुंच गए। वहाँ आश्रममें ध्यान किया लेकिन एक हिरनके बच्चेसे आसक्त हो गए और साधना खंडित हो गयी फलस्वरूप इनको अगला जन्म हिरनके रूपमें कालंजर पर्वत पर हुआ । भरतको उनका पिछला जन्म याद था अतः कालंजर पर्वतको त्याग कर पुनः शालग्राम क्षेत्र पुलहाश्रम , गण्डकी नदीके तट पर आ गए और गण्डकी नदीमें हिरनके रूप में जल समाधि ले ली ।
 * भरतका तीसरा जन्म अंगिरस गोत्रमें एक ब्राह्मण कुलमें
 हुआ । भरतको यहाँ जड़ भरत के नाम से देखा गया । जड़ भरत सिंध सौबीर राज्यके राजा रहूगणको इक्षुमती नदीके तट पर ज्ञान दिया । इक्षुमती नदी कुरुक्षेत्रसे गुजरती थी और सरस्वती - सिंध नदियोंकी तरह अरब सागरमें जा मिलती थी । 
 ~~~ ॐ ~~~

Tuesday, October 8, 2013

बुद्ध पुरुष का महानिर्वाण

● बुद्धका निर्वाण ● 
 ~ बुद्ध पुरुष अपनी मौतका द्रष्टा होते हैं । 
~ बुद्ध पुरुष स्वेच्छासे प्राण त्यागते हैं । 
~ बुद्ध पुरुषकी मौत इन्तजार करती है । 
<> बुद्ध पुरुष कैसे प्राण त्याग करते हैं ? 
* पहले योग्य जगहकी तलाश करते हैं । 
* उसका इन्तजार करते हैं जिसे अपनी ज्योति देनी होती है । 
°° फिर °° 
° वाणीको मनमें ---- 
° मनको प्राणमें ----
 ° प्राणको अपान वायुमें ---
 ° अपान वायुको उसकी क्रियाओं सहित मृत्युमें --- 
° मृत्युको पञ्चभूतमय शरीरमें लीन करते हैं । 
 ^^ यह भागवतका सार है ^^ 
~~~ ॐ ~~~

Wednesday, October 2, 2013

भागवत स्कंदग - 2 ( सार )

● भागवत स्कन्ध - 2 ( सार ) 
 <> भागवत स्कन्ध - 2 में निम्न बातें हैं । 
* 10 अध्याय हैं । 
* 382 श्लोक हैं ।
 * यह स्कंध शुकदेव - परीक्षित संबादके रूपमें है । 
°° स्कन्धके ध्यान सूत्र °°
 1- भोगीका दिन धन संग्रह और रात स्त्रीकी तलाशमें गुजरती
 है । 
2- जीवोंमें मात्र मनुष्य ऐसा जीव है जिसके अन्दर प्रभुकी सोच किसी न किसी रूपमें होती है । 
3- होशमय एक घडीका जीवन बेहोशीके 100 वर्षके जीवनसे उत्तम जीवन है ।
 4- शुकदेव जी कह रहे हैं , परीक्षित अभी तुम्हारी मौत सात दिन आगे है तुम चाहो तो वैराज्ञ माध्यमसे मोह ,माया मुक्त हो कर परम गति प्राप्त कर सकते हो । 
5- आसन , श्वास ,इन्द्रिय और आसक्ति नियंत्रणसे वैराज्ञमें उतरा जा सकता है । 
6- वह जिसको अंत समय तक देश -कालसे विरक्ति हो जाती है वह परम गतिका राही होता है । 
7- भागवत : 2.5 : ब्रह्मा का सृष्टि विज्ञान : 
 * माया पर कालके प्रभावसे > महतत्त्वकी उत्पत्ति हुयी । 
* महतत्त्व पर कालका प्रभाव हुआ और तीन अहंकार उपजे । 
* सात्विक अहंकारसे मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवोंकी उत्पति हुयी ।
 * राजस अहंकारसे 10 इन्द्रियाँ , बुद्धि और प्राण बना ।
 * तामस अहंकारसे आकाश बना और आकाशका गुण है शब्द तन्मात्र । 
^ आकाश पर कालका प्रभाव वायुको उत्पन्न किया और वायुका तन्मात्र है स्पर्श । 
^ वायु कालके प्रभावमें तेजको पैदा किया , तेजका तन्मात्र है
 रूप । 
^ तेज और कालसे जल बना , जलका तन्मात्र है रस । 
^ जल और कालसे पृथ्वी बनी ,पृथ्वीका तन्तात्र है गंध ।
 ^^ 05 बिषय ( तन्मात्र ), 05 महाभूत ,11 इन्द्रियाँ ,
 बुद्धि ,तीन अहंकार और तीन गुणों से ब्रह्माण्ड एवं देह पिंडकी रचना है । 
8- भागवत : 2.9 में भागवतके 10 लक्षणों को ब्यक्य किया गया है जो निम्न प्रकारसे हैं । 
* सर्ग *विसर्ग *पोषण * ऊति *मन्वन्तर *ईशानुकथा *निरोध *मुक्ति *आश्रय । # सर्ग : महतत्त्व +महाभूत +अहंकार + इन्द्रियोंकी उत्पति सर्ग है । # विसर्ग : ब्रह्माकी उत्पत्तियाँ जिंक्स आधार सर्ग हैं , विसर्ग कहलाती हैं । 
< भागवत स्कन्ध - 2 समाप्त < 
~~ ॐ ~~

Saturday, September 28, 2013

भागवत स्कन्ध - 01 सार

* स्कन्ध - 01 का सार *
> स्कन्ध -1 में 809 श्लोक 19 अध्यायोंमें बटे हुए हैं ।
इस स्कन्धका सार कुछ इस प्रकार है :----
1- नारद बृंदाबनमें यमुनाके तट पर भक्ति से मिले। भक्ति वहाँ अपनें बेटे ज्ञान एवं वैराज्ञ के साथ थी । भक्ति कहती है - मैं द्रविण देश में पैदा हुयी ,कर्नाटकमें बढ़ी , महाराष्ट्रमें बच्चे हुए और गुजरात जब मैं पहुंची तब मैं और मेरे दोनों बच्चे उम्रसे अधिक बूढ़े हो गए और वहाँ मेरा अस्तित्व ही समाप्त सा हो गया । मैं अपनें बच्चोंके संग बृंदाबन आ गयी । यहाँ मैं तो जवान हो गयी लेकिन देखो मेरे दोनों बच्चे मुझसे भी अधिक बूढ़े हैं और दिन भर सोते रहते हैं । नारद कहते हैं - यह बृंदाबन भक्ति केलिए हैं जहां भक्ति सदैव जवान रहती है लेकिन यहाँ ज्ञान - वैराज्ञके लिए कोई जगह नहीं , ज्ञान - वैराज्ञ को चाहनें वाले यहाँ नहीं हैं । > नारदकी बातको समझिये ; वह भक्ति जिससे ज्ञान - वैराज्ञ नहीं आता , वह भक्ति अपरा भक्ति है जो परा भक्तिका द्वार बन सकती है लेकिन बृंदाबनमें परा भक्तिका उदय नहीं हो सकता । बात है तो बहुत कडुयी पर ध्यान योज्ञ है ।
2- विष्णुके विभिन्न अवतारोंका वर्णन किया गया है जैसे दूसरा अवातार वाराह का , पांचवां अवतार सांख्य योगी कपिल का , आठवां अवतार रिषभदेवजीका , सोलहवां परशुरामजीका , 18वां श्री रामका बीसवां अवतार कृष्णका बताया गया है ।
3- गर्भमें स्थित परिक्षितको अश्वस्थामा मारना चाहता था लेकिन कृष्ण उनकी रक्षा किये ।
4- कृष्ण एवं पांडव बंधु भीष्म पितामहसे मिलनें हेतु कुरुक्षेत्रकी यात्रा की और वहाँ भीष्म पितामहसे ज्ञान प्राप्त किया । भीष्म कुरुक्षेत्र में सूर्यके उत्तरायण होनेंकी प्रतीक्षामें बाणों की सेज पर लेटे हुए थे । युधिष्ठिरसे बात करते - करते सूर्य उत्तरायण हो गए और भीष्म परम धामकी यात्रा पर देह त्याग कर चल पड़े और युधिष्ठिर उनकी अंतिम क्रिया किये ।
5- विदुर महाभारत युद्धके समय कौरवों द्वारा तिरस्कृत होनें के कारण तीर्थ यात्रा पर थे और द्वारकाके पास प्रभास क्षेत्रमें उनको पता चला की युद्ध समाप्त हो चला है और युधिष्ठिर हस्तिनापुरके सम्राट बन चुके हैं । विदुर वहाँसे वापिस हो लिए और बृंदा बन में यमुना तट पर उनकी मुलाक़ात उद्धवसे हुयी । उद्धव प्रभु के बाल लीलाओं के सम्बन्ध में विदुर को ज्ञान दिया और यह भी बताया की प्रभु अपनें स्वधाम चले गए हैं और द्वारका सहित यदु कुल समाप्त हो गया है ।
6- विदुर हस्तिनापुर आये और अपनी यात्रा के सम्बन्ध में युधिष्ठिर को बताया लेकिन प्रभु के न होनें की बात को छिपा लिया । विदुरको सत्यका पता था अतः धृतराष्ट्र एवं गांधारीको सप्त श्रोत आखिरी समय ध्यान करने हेतु जानें को राजी कर लिए और वे सप्त श्रोतकी यात्रा पर चले गए । जहां सात ऋषियोंको प्रसन्न करने हेतु गंगा सात धाराओंमें विभक्त होती हैं उसे सप्त श्रोत कहते हैं ।सप्त श्रोत हरिद्वार और गंगोत्रीके मध्य कहीं होगा।
7- जिस समय द्वारका का एवं यदुकुलका अंत हुआ उस समय सात माहसे अर्जुन द्वारका में ही थे । कृष्ण अर्जुनको प्रभास क्षेत्रसे अपनें सारथी दारुकके माध्यमसे यह संदेशा द्वारका भेजा था कि आजसे ठीक सात दिन बाद द्वारका समुद्रमें समा जाने वाली है अतः द्वारका में जो लोग हैं उनको तुरंत अर्जुनके साथ इंद्रप्रष्ठ चले जाना चाहिए । प्रभु यह संदेश भेज कर स्व धाम चले गए । प्रभास क्षेत्र वह पवित्र तीर्थ है जहां पश्चिममें सरस्वती अरब सागरमें मिलती हैं और यदु कुलका अंत भी यहाँ हुआ था ।
8- जिस समय द्वारका का अंत होना था उस समय द्वारका प्रभुसे मिलनें 11 ऋषि लोग आये थे ( विश्वामित्र ,असित ,कण्व ,दुर्बासा ,भृगु ,अंगीरा ,कश्यप ,वामदेव ,अत्रि ,वशिष्ठ ,नारद ) । ये ऋषि प्रभुसे मिल कर पिंडारक क्षेत्रमें रुके हुए थे । जाम्बवती नंदन साम्बको स्त्री बना कर यदु पुत्र ऋषियोंसे मजाक किया और ऋषि उनके अंत होनें के साथ साथ द्वारका अंत होनें का श्राप दे दिया ।
9- प्रभुके आदेशसे सभी द्वारका बासी प्रभास क्षेत्र आ गए और स्त्रियाँ एवं बच्चे शंखोद्धारक क्षेत्र में जा रुके । प्रभासक्षेत्रमें पूजा - दान आदि किया गया फिर मैरेयक - वारुनी मदिरा पी कर सभीं यदुबंसी आपसमें लड्नें लगे और सबका अंत हो गया ।
10- कौशिकी नदीके तट पर समीक ऋषिके पुत्र श्रृंगी ऋषि परीक्षितको श्राप दिए कि आज से ठीक सात दिन बाद तुम्हारी मौत तक्षकके डंक मारने से होगी । परीक्षित राज्यका भार जन्मेजयको दे कर गंगाके तट पर आमरण अनसन पर बैठ गए तथा 66 वर्षीय परीक्षित को 16 वर्षीय शुखदेव जी भागवत की कथा सुनायी ।
~~ ॐ~~