Thursday, August 29, 2013

यशोदाके वे तीन माह

●● यशोदाके वे तीन माह ●●
°° भागवत स्कन्ध - 10 , अध्याय 82-84 में 163 श्लोकोंके माध्यमसे यशोदा और कृष्ण - बलराम मिलनको ब्यक्त करनेंकी कोशिश की गयी है जिसके आधार पर यह प्रस्तुति है ।
°° नन्द परिवार गोप - गोपियाँ और यदु कुलके लोग कुरुक्षेत्रमें तीन माह एक साथ गुजारा
°° इस अवसर बसुदेवजी ऋषियोंके आदेश पर एक यज्ञ किया
°° यह अवसर था सर्वग्रास सूर्य ग्रहण का , ऐसा ग्रहण प्रलय काल में लगता है
°° इस अवसर पर यहाँ मत्स्य ,उशीनर ,कोसल विदर्भ ,कुरु ,सृंजय ,काम्बोज , कैकेय , मद्र ,कृति ,आनर्त ,केरल एवं अन्य सभीं जगहों से लोग आये हुए थे
°° ब्यास ,नारद ,च्यवन ,देवल ,असित ,विश्वामित्र ,शतानंद ,भरद्वाज ,गौतम ,परसुराम वसिष्ठ ,गालव ,
भृगु ,पुलस्त्य ,कश्यप ,अत्रि , मार्कंडेय ,बृहस्पति , सनत कुमार , अंगीरा ,अगस्त्य ,याज्ञवल्क्य और वाम देव जिदे ऋषि मुनि भी आये हुए थे अब आगे :-
** आजका कुरुक्षेत्र मथुरासे 320 किलो मीटर है । सर्वग्रास सूर्य ग्रहण जैसा प्रलयके समय लगता है वैसा लगनें वाला था , यह बात बर्षा ऋतु प्रारम्भ होनेंके लगभग 03 माह पहले की है अर्थात यह ग्रहण फरवरी में लगा होगा । यह घटना महाभारत युद्धसे पहलेकी है लेकिन उस समय तक प्रभु श्री कृष्णकी तीसरी पीढ़ी प्रौढ़ हो चुकी थी । द्वारकासे यदु कुलके लोग कुरुक्षेत्र आ गए थे पीछे द्वारकाकी सुरक्षा हेतु यदु सेनाध्यक्ष कृतवर्मा और प्रभुके पौत्र अनुरुद्ध वहाँ रुक गए थे ।
^^ नंदको पता चला कि उनका कान्हा कुरुक्षेत्रमें है , यह हवा पुरे ब्रजमें फैल गयी और नन्द परिवार , गोप और गोपियाँ चल पड़े कुरुक्षेत्रके लिए .......
● सोचना इस दृश्यके सम्बन्धमें , इस स्थिति की गहरी सोच अपरा भक्तिमें पहुंचा सकती है
^^ कान्हा 11 सालके थे जब माँ यशोदासे जुदा हुए थे , वह माँ जो एक पलभी कान्हा बिना नहीं रह सकती थी वही माँ आज लगभग 50 - 60 सालके बाद अपनें कान्हासे मिलनें जा रही है , उसके अन्तः करणमें किस उर्जा का संचार हो रहा होगा ? जरा सोचिये इस बात पर ।50-60 वर्ष एक अनुमान है क्योंकि प्रभु जब परम धाम गए उस समय उनकी उम्र थी 125 साल की थी और इस समय उनके पौत्र भी जवान हो चुके हैं अतः यह ग्रहण महाभारत के पूर्व प्रभु के मध्य उम्रकी बात हो सकती है ।इस ग्रहण में कौरव और पांडव दोनों पक्ष के लोग प्यार पूर्वक भाग लिया था ।
¢ प्रभु मात्र 11 सालके थे जब क्रूरजी उनको मथुरा ले गए थे । कंश बधके बाद पुनः प्रभु और बलराम यशोदा - नन्दसे मिलनें कभीं नहीं गए जबकि मथुरा से नन्द गाँव 30 किलो मीटर दूर है। कन्हैया जब 06 सालके थे उनको गाय चरानें की अनुमति मिल गयी थी और वे नन्द गाँव से वृन्दावन जो लगभग 50 किलो मीटर दूर है , गाय चरानें हेतु जाते थे लेकिन मथुरा जाने के बाद उनको 30 किलो मीटर पर स्थित नन्द गाँव पुनः माँ यशोदा , नन्द और अपनी प्यारी गोपियोंसे मिलनें का वक़्त न मिल पाया ।
** कन्हैया और गोपियाँ शरीरसे 50 साल और बूढ़े हो चले हैं , जब एक दूसरेके आमनें सामनें हुए तब दोनों पक्ष मूक संबाद करनें लगा । गोपियाँ जो पूछती थी उसका जबाब प्रभु मौन से देते थे और प्रभु क्या पूछेंगे ,वे तो त्रिकाल दर्शी हैं । इस अवसर पर गोपियाँ और प्रभु कृष्ण वहाँ से एकाएक गायब हो
गए , लोग उन्हें खोजनें लगे लेकिन कहीं उनकी सुध न लग पायी । कान्हा और उनकी गोपियाँ सरस्वती के तट पर महारासमें लीन हो हो गए थे । इस महारासको कोई भौतिक आँखोंसे ।तो देख नहीं सकता था ।
** यशोदा -नन्द और गोप -गिपियाँ कुरुक्षेत्रमें तीन माह रहे और जब बरसात के दिन आने को हुए तब नन्द बाबा -यशोदा को भेटें देकर बिदा किया गया और यदु कुल सरस्वती तट से द्वारका के लिए चल पड़ा ।
अगले अंक में देखना कि आगे यशोदाके साथ क्या घटना घटी ?
~~~ ॐ ~~~~

Thursday, August 15, 2013

भागवतसे ..... 03

भागवतमें गंगा -- 02
सन्दर्भ : भागवत : खंड - 01 माहात्म्य + 1.13 + 1.19 + 3.20 + 6.4 + 9.22 + 9.23
एक सोच :

  • त्रेता युगमें सरयू अयोध्याको अपनेंमें बिलीन कर लिया था 
  • द्वापरमें अरब सागर जिसमें द्वारका एक 48 बर्ग मील का टापू था , उसे अपनेंमें बिलीन कर लिया 

और 

  • हस्तिना पुर जो गंगाके तट पर सम्पूर्ण पृथ्वी की राजधानी के रूप में था उसे गंगा बहा ले गयी 

इस बात से ----

  • काल की गति स्पष्ट होती है 

और
 काल की गति अर्थात प्रकृतिमें हर पल हो रहा बदलावसे एक ध्वनि निकलती है
 जिसको यदि वैज्ञानिक पकड़ सकें तो वह धुन है
 एक ओंकार की 

पीछले अंक में आप देखे की गंगा मेरु पर्वत पर उतरते ही 04 रूपों में विभक्त होजाती है और जिस गंगा को हम सब भारतीय समझते हैं वह गंगा अलकनंदाके रूप में हेम कूट पर्वत और हिमालय को पार करती हुयी भारत वर्ष में प्रवेश करती हैं और गंगा सागर संगम से हिंद महासागर में उतर कर सागर बन जाती है /
अब कुछ और बातें भागवत से ही :-----
1- सांतनु जो यदि भूल कर भी किसी बृद्ध को स्पर्श कर देते थे तो वह युवा हो उठत था , उनसे और गंगा से भीम का जन्म हुआ /
2- गंगा हिमायायके दक्षिणमें सप्त ऋषियों के लिए सात भागों में विभक्त हो जाती हैं  जिसको सप्त श्रोत कहते हैं / यह वह जगह है जहाँ हार समय सिद्ध योगी रहते हैं और इस स्थान पर धृत राष्ट्र एवं गांधारी अपना आपना शरीर त्याग किया था /
3- कुशावर्त क्षेत्र जो गंगा द्वार [ हरिद्वार ] के समीप है , वहाँ मैत्रेय ऋषि का आश्रम हुआ करता था , जहाँ विदुर को तत्त्व - ज्ञान मिला था 
4- गंगा द्वार के समीप ही आनंद तट जहाँ नारद को सनकादि ऋषि भागवत की कथा सुनायी थी  /
5- गंगा के तट पर विन्ध्याचल एक शक्ति पीठ है मिर्ज़ापुरके पास , वहाँ पहाड़ों में एक अघमर्षण तीर्थ हुआ करता था जहाँ प्रजापति दक्ष घोट तप किये थे /
6- गंगा में पेटारी में रखा हुआ एक बच्चा अधीरत को मिला था जो कुंती का पुत्र कर्ण था
 और अधीरत निःसंतान थे /
7- परीक्षित से आजतक का समय [ भागवत : 12.1-12..2 ] 3450 वर्ष हो चुका है [ 2013 तक ] /
8- परीक्षित के बाद पांचवीं पीढ़ी में नेभीचक्र सम्राट हुए जिनके समय में गंगा हस्तिनापुरको बहा ले गयी थी  और नेभिचक्र प्रयागके पास कौशाम्बीमें अपनी राजधानी बसायी थी /कौशाम्बी बुद्धके समय सर्व संपन्न ब्यापारिक केन्द्र था , जहाँ प्रायः बुद्ध आया करते थे /
9- जनमेजय याज्ञवल्क्य एक महान गणितज्ञ एवं  खगोल शात्री से शिक्षा ग्रहण की थी 

=== ओम् ====

Tuesday, August 13, 2013

श्रीमद्भागवत से ..... 02

भागवत में गंगा जी
भागवत में गंगाका सन्दर्भ : 9.8 + 9.9 + 5.16 + 5.17 
पहले दो बातें :
1- हरिद्वारके बाद गंगा सागर तक की यात्रामें से यदि प्रयाग और  काशी को हटा कर देखें तो गंगा एक साधारण नदी के रूप में दिखती हैं 
2- गंगा की 2525 Km की यात्रा में मात्र 12नदियाँ गंगासे  मिलती हैं जिनमें 04 दाहिनें तट की ओर और अन्य 08 बाएं तट की ओर से  / जो नदियाँ गंगा की सहायक नदियाँ हैं उनमें से अधिकाँश ऐतिहासिक नदियाँ हैं जैसे
 गंडकी , गोमती , यमुना , पुनपुन , कोशी और महानंदा आदि / 
अब भागवत से -----
त्रिशंकुका नाम सभीं जानते हैं ; कहते हैं त्रिशंकु न स्वर्ग में हैं न मृत्यु लोकमें अपितु ये अंतरिक्ष में लटक रहे हैं जिनका सर नीचे पृथ्वी को देख रहा है और पैर ऊपर स्वर्ग  जाना चाहते हैं / त्रिशंकू के बंश में हरिश्चंदके बाद आठवें सम्राट हुए सम्राट सगर/ सम्राट सगर अश्वमेघ यज्ञ हेतु घोड़ा भेजा था जिसको इन्द्र चुरा कर आज के गंगा सागर पर छिपा दिया था जहाँ उस संमय सिद्ध योगी कपिल जी तप कर रहे थे /  कपिल जी को पाँचवाँ विष्णु का अवतार कहा जाता है और गीता में कृष्ण कहते भी हैं कि सिद्धानां कपिलः अहम् अर्थात सिद्ध योगियों में कपिल मुनि मैं हूँ / कपिल जी का आश्रम सरस्वतीके तट पर विन्दुसर था जो द्वापर का तीर्थ तो था ही आज भी तीर्थ है / विन्दु सरोवर पांच पवित्र सरोवरों में से एक है जो कपिल जी के पिता कर्मद ऋषि का आश्रम था और इस स्थान पर कर्मद ऋषि 10,000 वर्ष तप में गुजारे थे / सगरके पुत्र घोड़ा खोजते खोजते वहाँ पहुंचे और सोचा कि यह योगी जो ध्यान में है , हो न हो हमारे घोड़े को यहाँ छिपा रखा हो और इस भ्रान्ति में वे सभीं कपिल को बिना समझे बुरा भला कहनें लगे और उनको  मारनें पर भी उतर आये / कपिल जी समभाव योगी थे , उनके आँख खुलते ही वे सभीं सगर के पुत्र वहीं जल कर राख हो गए /

 सगरके पौत्र थे अंशुमान जो जन्म से सिद्ध थे , सगर  अंशुमान को घोड़ा खोजनें हेतु भेजा , वे गए और घोड़ा ले आये / अंशुमान ज्यों ही कपिल के ऊर्जा क्षेत्र में पहुंचे , कपिल की ऊर्जा उनको अपनी ओर खीच ली और वे झुक कर प्रणाम किया और वहीं बैठ गए /
 एक अवतार और एक अवतार को समझनें वाला सिद्ध योगी आमनें सामनें थे कुछ पल के लिए / कपिल अंशुमान को बोले , अंशुमान ! इन लोगों का उद्धार तब होगा जब गंगा का जल इन पर पडेगा / 
अंशुमान , अंशुमन के पुत्र दिलीप तप किये गंगा को लानें हेतु लेकिन सफल न हो सके लेकिन  दिलीप के पुत्र भगीरथ  सफल हुए और गंगा को ले आये / आगे आगे भगीरथ  चल रहे थे और पीछे पीछे गंगा  चल रही थी , गंगा सगर के पुत्रों के राख के ढेर के ऊपर से  होती हुयी सागर से जा मिली / आज गंगा सागर संगम तीर्थ है / 

गंगा भगीरथ से एक प्रश्न किया था आनेंसे  पहले जो महत्वपूर्ण है और इस प्रकार से है -----
गंगा कहती हैं .....
 लोग अपनी गन्दगी मुझ में धोयेंगे लेकिन मैं निर्मल कैसे होउंगी ?
 भागीरथ बोले ...
 आप के तट पर अनेक सिद्ध योगी तप करते  होंगे उन लोगों के स्पर्श से आप सदैव पवित्र बनी रहेंगी /

गंगा जम्बू द्वीप के  मध्य में स्थित इलाबृत्तवर्ष के मध्य में स्थित मेरु पर्वत पर उतरी और चार भागों में विभक्त हो गयी , इस प्रकार -----

* भद्रा के रूप में उत्तर दिशा में चल पडी जो रम्यक एवं हिरण्य वर्षों तथा नील , श्वेत और श्रृंगवान  पर्वतों को पार करके कुरु होती हुयी सागर से जा मिलती हैं 
** अलखनंदा के रूप में दक्षिण दिशा में बहती हुयी निषध , हेमकूट और हिमालय पर्वत को पार करती हुयी और हरिवर्ष , किम्पुरुष वर्षों को पार करती हुयी भारतवर्ष में प्रवेश करती हैं / 
*** सीता के रूप में मेरु पर्वत से चल कर गंध मादन पर्वत से होती हुयी भद्राश्ववर्ष से हो कर सागर में मिलती हैं 
**** चक्षु के रूप में पश्चिम दिशा में चल कर केतुमाल वर्ष और माल्यावान पर्वत से हो कर सागर से मिलती हैं /

> हिमालय के उत्तर में तीसरा पहाड है मेरु जो जम्बू द्वीप का केन्द्र है 
> हिमालय के उत्तर में छठवांवर्ष है कुरु जो जम्बू द्वीप का आखिरी वर्ष है 
> हिमालय के दक्षिण में एक वर्ष है भारत 
ऊपर दी गयी सूचनाएं शोध के बिषय हैं 

=== ओम् =======


Sunday, August 11, 2013

श्रीमद्भागवत से ----[ 01 ]

रास और महारास भाग - 01 

सन्दर्भ : भागवत > 10.20 - 10.22 , 10.29 - 10.33 , भागवत द्वितीय खंड महात्म्य 

भागवतके 08 अध्यायों एवं भागवत महात्म [ भागवत खंड - 02 ] के 181 श्लोकों का सार :---
यहाँ आप बुद्धि स्तर पर उसकी एक झल्लाक देखनें जा रहे हैं जो बुद्धिके परे की अनुभूति है /
क्या है रास और महारास ?

युधिष्ठिर को जब  प्रभुके  परम धाम यात्राका पता चला तब युधिष्ठिर बज्रनाभको  मथुरा एवंम शूरसेन मंडलका  राजा बनाया औरअभिमन्युके पुत्र परीक्षितको हस्तिनापुरका सम्राट बना कर अपनें भाइयोंके साथ हिमालय पर स्वर्गारोहण यात्रा पर निकल पड़े / बज्रनाथ प्रभु श्री कृष्णके प्रपौत्र थे / 

परीक्षित जी बज्रनाभ से मिलनें मथुरा आये और बज्रनाभ मथुराकी स्थितिका वर्णन करते हुए दुःख जताया / बज्र नाभ कहते हैं , मैं राजा तो मथुरा  मंडल का हूँ , यह बात तो मैं समझता हूँ लेकिन अब मथुरा मंडल नाम ही नाम है , पता नहीं यहाँके लोग , बंदर , पेड़ - पौधे , झरनें और गौवें आदि कहाँ चले गए , यह मंडल तो एक वीरान धरती है / परीक्षित बज्रनाभ के प्रश्न का समाधान शांडिल्य ऋषिसे करवाते हैं /

पूर्णावतार प्रभु श्री कृष्ण द्वापरके आखिरी चरणमें लगभग 125 वर्षों तक देव , दानव , असुर , पशु , जड़ और चेतनकके साथ जो कुछ भी लीला रूपमें दिखाया वह कलियुग में रख रहे मनुष्योंके लिए एक ऎसी झलक थी जिसकी स्मृति कलियुगके प्रारंभिक चरण में अपना चरण रख रहे लोगोंको कलियुगकके सम्मोहन से दूर रख सकता है / 

शांडिल्य ऋषि बज्रनाभ को सलाह दिए कि राजन जहाँ - जहाँ आप के दादाजी लीला , रास लीला किया है वहाँ - वहाँ आप अपनी छावनियां बनवायें और उन स्थानों को बसाएं / परीक्षित इन्द्रप्रष्ठ से ब्यापारियोंको , बंदरोंको और अन्य लोगों को मथुरा भेजा , मथुरा को पुनः बसानें हेतु /

प्रभुके जब परम धाम जानें का समय  आया तो वे पहले अपनें पार्षधोको स्वर्ग भेज दिया और जो उनके अनन्य प्रेमी थे जो मथुरा मंडल में थे , पहले तो उन सबको द्वारका पहुंचाए और जब द्वारका का अंत होनें का समय आया तब उन सब को उनके मूल स्थानों को भेज दिया और अंत में स्वयं अपनें मूल निवास परम  धाम की यात्रा पर चल पड़े / 

प्रभुके परम धाम जानें का जब समय आया तब उनसे मिलनें  उस समय के सिद्ध 11 ऋषियों का एक दल द्वारका पहुंचा था / ऋषियों और प्रभुके मध्य क्या वार्ता हुयी , यहाँ उसे ब्यक्त करना कठिन है लेकिन उस दिनसे ठीक सात दिन बाद न द्वारका रहा , न यदुकुल रहा , द्वारका समुद्र में एक टापू था जिसका क्षेत्र फल था लहभग 90 वर्ग
 मील , जिए सागर अपनें में छिपालिया / 

मथुरा मंडल क्यों और कैसे रिक्त हुआ ? इस प्रश्न का उत्तर अगले अंक में आप देख सकेंगे /

==== ओम् =======

Friday, July 26, 2013

भागवत साधन सूत्र - 03

भागवत साधना सूत्र - 03: भागवत से :---
1- 1.3 > अज्ञान की बृत्तियाँ - अविद्या , मोह ,
राग ,द्वेष ,अभिनिवेश
2- 1.7 > निर्मल मन माया और मायापति का द्रष्टा होता है
3-1.6 > जिस बस्तुके खानेंसे जो रोग होता है उस बस्तु में उस रोगकी दवा होती है
4- 1.1 > इन्द्रिय - मन तंत्र की पहुँच जहां तक है उसकी तह में जो होता है वह है प्रभु
5- 11.19 > तप क्या है ? जिसके अभयद से कामनाओं का उठाना समाप्त हो , वह तप है ।
6- 4.20 > शुद्ध चित्त की स्थिति ही कैवल्य है
7- 4.18 > बुद्धिमान ब्यक्ति भ्रमर जैसा होता है जो सर्वत्र से ज्ञान अर्जित कर लेता है
8- 2.1> महत्तत्व क्या है ? आत्मा का नाम महत्तत्व है
9- 2.7 > वैदिक या लौकिक किसी भी शब्द की पहुँच प्रभु तक नहीं
10- 2.8 > जीव का कोई सम्बन्ध पञ्च भूतों से नहीं लेकिन जीव का शरीर पञ्च भूतों से निर्मित होता है
~~ ॐ ~~~

Tuesday, July 16, 2013

श्रीमदभागवत स्कन्ध -01

Title :श्रीमद्भागवत पुराण स्कन्ध एक - सार Content: - श्रीमद्भागवत पुराण - <> प्रथम स्कन्ध का सार <> ● श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्द में 19 अध्यायों में 809 श्लोक हैं ।आइये ! आप और मैं इस स्कन्ध में यात्रा करते हैं :------- ● प्रारम्भ : नैमिष आरण्य में प्रभु प्राप्ति एवं कलियुग के प्रभाव से दूर रहनें हेतु सहस्त्र वर्ष तक चलनें वाले एक यज्ञ का आयोजन चल रहा था । वहाँ सूत जी का आना हुआ । सौनकआदि ऋषि सूतजी से भागवत की कथा सुननें की इच्छा दिखाये । सौनक आदि ऋषि प्रश्न करते हैं और सूत जी उन प्रश्नों के उत्तर वेद व्यास रचित भागवत के आधार पर देते हैं । <> नारद का पिछला जन्म <> ● वेद व्यास जी नारद के पिछले जन्म के सम्बन्ध में जानना चाहते हैं और इस सम्बन्ध में नारद कहते हैं - पिछले जन्म में मैं वेद पाठियों के दासी का पुत्र था । मैं उन लोगों की सेवा करता था और उनके अमृत वचनों को सुनता रहता था । उस समय मेरी उम्र 05 साल की थी जब मेरी माँ सर्प डंक से मौत के मुह में समा गयी । मैं माँ के वियोग में हिमालय की ओर चलता गया और एक पेड़ के नीचे जब थक कर सो रहा था तब आकाशवाणी हुयी , प्रभु कहते हैं , नारद इस जन्म में तो तूँ मुझे नहीं देख सकता लेकिन अगले जन्म में तूँ सदैव मेरे साथ ही रहेगा, एक अनन्य भक्त के रूप में । <> भागवत की रचना <> वेद व्यास जी सरस्वती नदी में स्नान करके अपने आश्रम में किसी गहन सोच में डूब रहे थे । वहाँ नारद जी पधारे और वेद व्यास के चिंता को समझते हुए उनको सलाह देते है , भागवत की रचना हेतु । ●12 स्कंधों और 18000 श्लोकों का भागवत पुराण की रचना वेद व्यास द्वारा सरस्वती नदी के पश्चिमी तट पर अपनें आश्रम पर नारद के सुझाव पर की गयी जहां सुन्दर बेरों का जंगल था तथा शम्याप्रास आश्रम भी था । शाम्यप्रास आश्रम पर हर समय यज्ञ हुआ करते थे ।रचना को सबसे पहले वेद व्यास जी अपनें पुत्र शुकदेव जी को सुनाया । € यहाँ एस्प उस जगह के सम्बन्ध में सोचे जो बेरों के जंगल में हो और जहां से सरस्वती नदी के गोनें की भी सम्भावना हो । <> स्कन्ध - 01 की कुछ और बातें <> ● अश्वत्थामा जब महाभारत युद्ध चल रहा था तब तीन बार अपना रंग दिखाया ..... 1 > सो रहे द्रोपती के पुत्रों के सर को काट कर दुर्योधन को अर्पित किया लेकिन इस कृत्य से दुर्योधन खुश न हुआ । 2 > अर्जुन के ऊपर ब्रह्मशस्त्र का प्रयोग किया और प्रभु उसके सर की मणि को निकाल कर उसे गंजा करके समाज में एक तिरस्कृत ब्यक्ति की भांति रहनें को मजबूर कर दिया । 3 > उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित के ऊपर प्रहार किया और प्रभु द्वारा परीक्षित की रक्षा की गयी । ● प्रभु के साथ पांडवों का कुरुक्षेत्र ,भीष्म से धर्म की शिक्षा लेनें जाना । ● प्रभु के 21 अवतारों का संक्षिप्त वर्णन दिया गया है जिसमें 21वें अवतार के रूप में बुद्ध को देवताओं का विरोधी एवं असुरों को मोहित करनें का अवतार बताया गया है ।पाँचवाँ अवतार कपिल के रूप में , आठवाँ अवतार ऋषभ देव के एउओ में , नौवाँ अवतार राजा पृथु के रूप में बताया गया है , जीनके द्वारा औषधियों का दोहन हुआ ,बारहवाँ अवतार धन्वन्तरि के रूपमें ,सोलहवाँ अवतार परशुराम के रूपमें , 18वाँ अवतार श्री राम के रूप में , 19वाँ एवं 20वाँ अवतार बलराम एवं प्रभु श्री कृष्ण के रूप में और आखिरी अवतार बुद्ध के रूप में जिसको ऊपर ब्यक्त किया गया है । ● विदुर जी महाभारत युद्ध के समय तीर्थ यात्रा पर थे लेकिन प्रभास क्षेत्र में जब उनको पता चला कि हस्तिनापुर के सम्राट के रूप में अब युधिष्ठिर जी है तब विदुर जी अपनी यात्रा वहीं समाप्त करके वापिस हस्तिनापुर लौटते हैं और धृतराष्ट्र एवं गंधारी को अंतिम समय गुजारनें हेतु उनको हिमालय में सप्त श्रोत जानें के लिए राजी करते हैं। सप्त श्रोत वह जगह है जहां गंगा जी की सात धाराएं फूटती हैं । विदुर को प्रभु के परम धाम जाना और द्वारका का समुद्र में सना जाना ज्ञात था लेकिन युद्धिष्ठिर को वे बताये नहीं । ● अर्जुन द्वारका के अंत समय में सात माह वहीं थे और जब वापिस आ कर यदु कुल के अंत और प्रभु के परम धाम की बात युधिष्ठिर को बतायी तब युधिष्ठिर स्वर्गारोहण के किये चल पड़े । परीक्षित 36 साल की उम्रमें सम्राट बने और उनका ब्याह उत्तर की पुत्री इलावती से हो चूका था तथा जन्मेजय के साथ उनके चार पुत्र थे । ● शूरसेनाधिपति के रूप में अनुरुद्ध के पुत्र बज्रनाथ को स्थापित किया गया । ● परीक्षित जी 24 साल राज्य किये और जब उनका आखिरी समय आया तब वे शिकार खेलनें हेतु जंगल में गए । शिकार का पीछा करते हुए वे काफी दूर निकल गए और वे भूख - प्यास से भी बहुत पीड़ित हो रहे थे । वहाँ उनको एक आश्रम दिखा और वे आश्रम जा पहुंचे जहां समीक मुनि समाधि में उतरे हुए थे । परीक्षित को ऐसा आभाष हुआ की यह योगी मुझे अपमानित कर रहा है और वे क्रोध में आ कर उनके गले में एक मृत सर्प को लटका कर बाहर चल पड़े । कुछ दूरी पर कौशकी नदी के तट पर समीक मुनि के पुत्र श्रृंगी ऋषि थे । जब उनको पिता के अपमान का पता चला तब वे कौशकी नदी में आचमन करके परीक्षित को श्राप दिया - परीक्षित जा तूँ , आज से ठीक सात दिन बाद तक्षक के डंक मारनें से तेरी मौत होगी । परीक्षित को जब श्राप का पता चला जब वे जन्मेजय को सत्ता सौप कर गंगा के तट पर मौत की तैयारी में लग गए । श्री शुकदेव जी उस समय 16 साल के थे , वे परीक्षित से मिलनें आये और परीक्षित के आग्रह पर उनको भागवत कथा सुनाई। परीक्षित 10 माह गर्भ में थे , 24 वर्ष राज्य किया और 60 वर्ष कुई उम्र में उनका अंत हुआ । ● द्वारका में जो लोग रहते थे ● मधु ,भोज , दशाई ,अर्ह ,कुकुर,अन्धक ,बृष्टिवंशी ● हस्तिनापुर से द्वारका का मार्ग ● हस्तिनापुर > कुरु जंगल > पांचाल > शूरसेन ब्रह्मवर्त ( यमुना का तटीय प्रदेश ) > कुरुक्षेत्र मत्स्य >सारस्वत > मरुध्वन > सौबीर > आभीर आनर्त ( आभीर के पश्चिम में )- इस मार्ग से प्रभु ● श्री कृष्ण महाभारत युद्ध के बाद कई माह तक हस्तिनापुर में रह कर द्वारका गए थे । ●° स्कन्ध - 01 में ध्यान योग्य सूत्र ●° * जिस बस्तु के सेवन से जो मर्ज हुआ होता है उसी बस्तु में उस मर्ज की दवा भी होती है , मात्र सेवन का तरीका अलग होता है । * 11 इन्द्रियाँ एवं 05 बिषयों के साथ महत्तत्त्व से प्रभु पुरुष रूप धारण किया , सृष्टि की रचना हेतु । इन सोलह तत्त्वों को सोलह कला कहते हैं । * प्रभु जी 16000 रानियाँ और 07 माताएं थी । ● भीष्म कहते हैं - बड़ा आश्चर्य होता है यह देख कर कि जहां सुदर्शन चक्र धारी कृष्ण हों , जहां धर्म पुत्र युधिष्ठिर हों , जहां गांडीव धनुषधारी अर्जुन हो और जहां महाबली गदाधारी भीम हों वहाँ भी दुःख भरा जीवन हो ? ● कुंती कहती है - आप सबके अन्दर - बाहर समभाव से हैं । ● कुंती कहती है - इन्द्रियों की पहुँच जहां समाप्त होती है , आप उसकी तह में होते हैं । ~~~ॐ ~~~

Saturday, July 13, 2013

भागवत भाग - 08

Title :भागवत की कौशिकी नदी Content: कौशिकी नदी 1- भागवत : 9.14+9.15 कुरुक्षेत्रमें सरस्वतीके तट पर राजा पुरुरवा और उर्बशी का मिलन हुआ । इनके परिवार में आगे चल कर एक कन्या सत्यवती हुयी जो सभीं लोकों को पवित्र करनें हेतु कौशकी नदी बन गयी थी । 2- भागवत :1.18.24-37 राजा परीक्षित शिकार खेलते हुए बहुत दूर निकल गए और जब वे भूख - प्यास से ब्याकुल होनें लगे तब पास नें स्थित एक आश्रम में प्रवेश कर गए जहां समीक मुनि समाधि में उतर चुके थे , वे मुर्तिवर वहाँ थे , आश्रम में सम्राट के स्वागत के लिए कोई न था । परिक्षी आवाजें लगाते रहे लेकिन वहाँ कौन था जो उनका अभिबादन करता ? सम्राट को क्रोध आया और वे बिना सत्य को समझे समीक मुनिको न जानते हुए स्वतः अपमानित समझ कर उनके गले में एक मृत सर्प को माले की तरह लटका कर आश्रम से बाहर चले गए । कुछ दूरी पर समीक मुनि का पुत्र श्रृंगी कौशकी नदी के तट पर थे , जब उनको अपनें पिता के अपमान के सम्बन्ध में पता चला तब वे कौशिकी नदीमें आचमन करके सम्राट परीक्षितको श्राप दिया - सम्राट तूँ जा लेकिन ठीक आज से सात दिन बाद तेरी मौत तक्षक के डंक मारनें से होगी । ब्राह्मणके श्रापका पता परीक्षितको मिला और परीक्षित गंगा तट पर अपनें मौतकी तैयारीमें जुट गए । 3- भागवत :10.78+10.79 महाभारतके समय बलरामकी तीर्थ - यात्रा बलराम युद्धके पक्षमें न थे और जब उनको यकीन हो गया कि अब युद्ध को टाला नहीं जा सकता तब वे तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े । प्रभास क्षेत्र से वे उस दिशा में चल पड़े जिधर से सरस्वती आ रही थी । सरस्वती के किनारे - किनारे वे पृथुदक, विन्दुसर, मितकूप, सुदर्शन तीर्थ,विशाल तीर्थ ,ब्रह्म तीर्थ , चक्र तीर्थ , और पूर्ववाहिनी तीर्थों की यात्रा की । इसके बाद यमुना के तट पर स्थिर तीर्थो पर गए और फिर गंगा तट के तीर्थो में पहुँच कर पूजा किया । गंगा तट से वे नैमिष आरण्य गए जहां ऋषियों का सत्संग चल रहा था । नैमिष आरण्य से कौशिकी नदी के तट पर आये और स्नान करके उस सरोवर पर गए जहां से सरयू नदी चलती हैं । सरयू नदी के तट से कुछ यात्रा की फिर तट को छोड़ कर प्रयाग गए । ~~ यहाँ आप देखें ~~ सरयू नदी बहराइच नें करनाली नदी एवं महा काली ( शारदा ) नदियों के संगम से प्रारम्भ होती है । करनाली नदी मानसरोवर क्षेत्र से और महाकाली पिथौरागढ़ के कालापानी क्षेत्र से आती है । कुछ लोग मध्य प्रदेश में भिंड क्षेत्र में कौशकी नदी के होनें की बात करते हैं लेकिन भागवत के ऊपर दिए गए सन्दर्भों से यह नदी गोमती और गंगा के मध्य होनी चाहिए । --- ॐ ---